असमानता के दुष्चक्र में फंसता लोकतंत्र

लोगों के बीच लगातार बढ़ती आर्थिक असमानता पूरे देश को ऐसे बम पर बैठा रही है जो कि जब फटेगा तो सब कुछ शून्य कर देगा। यह जितनी देर में फटेगा, उतना ही भयानक होगा। इसका जल्द से जल्द हल खोजना चाहिए। इसके साथ सामाजिक असमानता पर तो कुछ कहने लायक ही नहीं है। वह 70 साल में भी बहुत कम नहीं हो पाई है। अभी राजनीतिक समानता काफी हद तक आ गई है। दलित और पिछड़े भी अपनी राजनीतिक शक्ति को पहचानने लगे हैं। राजनीतिक शक्ति का ही परिणाम है कि वे अब पीड़ित होने पर पुलिस स्टेशन तक जाने की हिम्मत जुटाते हैं। इसके ऊपर अब भी गिने चुने ही पहुंचते हैं।
पूरे देश में दो अप्रैल को जाे हुआ, उसे सामाजिक समानता पाने की एक उत्कंठा की तरह भी देखा जा सकता है। एससी एसटी एक्ट एक ऐसे कवच की तरह है जो उन्हें सामंती अत्याचार से बचाता है। बिना सोचे समझे इसके साथ छेड़छाड करना मतलब है बड़े तबके को ठगा महसूस कराना। इसमें बदलाव करना ही है तो यह काम संसद को करना चाहिए। सारे कानूनों का कम या ज्यादा दुरुपयोग हो ही रहा है। इसे ठीक करने के लिए एक कमेटी बनाई जा सकती थी। वह जरूरी सुझाव देती और गलत इस्तेमाल के आंकड़ों को संसद में रखती। इससे कानून कितना कारगर है, इसकी भी तस्वीर साफ होती।

राजनीतिक समानता के साथ सामाजिक समानता दूसरी सबसे महत्वपूर्ण समानता है। देखा जाए तो इतने सालों में समाज को सामाजिक भेदभाव से मुक्त हो जाना चाहिए था। लेकिन यह जस का तस बना हुआ है। अभी भी सवर्ण अपने गिलास में दलित को पानी नहीं पिलाते। इस असमानता काे तोड़ने की बजाए लोगों ने प्लास्टिक गिलास और डिस्पोजल पत्तल अपनाकर इस पर सुविधा का आवरण चढ़ा लिया।

हमें गांव का एक वाकया याद आता है। मैं 14-15 साल का था। एक दलित व्यक्ति के यहां से दूध आता था। लेकिन शर्त यह थी कि वह दुहता हमारे बर्तन में था। एक दिन उसने अपने बर्तन में दुह लिया तो हमने दूध लेने से मना कर दिया। घर वापस आया और शान से अपने इस घटिया व्यवहार के बारे में बताया। हालांकि किसी ने तारीफ तो नहीं की। लेकिन इसे गलत भी नहीं ठहराया। यह एक नमूना है सवर्ण समाज का। मैं उस वक्त तक कभी गांव से बाहर नहीं गया था। अब जब अपना वह व्यवहार याद आता है तो शर्मिंदगी होती है। मैं सोचता हूं कि उस व्यक्ति को कितनी पीड़ा हुई, जिससे कि उसने कभी दूध नहीं दिया ।

ऐसे कितने सामाजिक भेदभाव का सामना किसी दलित समाज में जन्में व्यक्ति को करना पड़ता है। अब भी कई सारे गांव ऐसे मिल जाएंगे जहां दलित को सामूहिक भोज में अलग बैठाया जाता है। यह भी मेरे गांव में कुछ लोगों ने किया था। लेकिन दलितों ने उन लोगों का बहिष्कार ही कर दिया। यह इसलिए हुआ क्योंकि वो राजनीतिक रूप से जाग चुके  हैं। इस तरह के व्यवहार होते रहे तो एक दिन वे भी उग्र  हो सकते हैं।

बाबा साहेब भीम राव अंबेडकर ने इस तरह के आसन्न संकट को आजादी की सुबह ही पहचान लिया था। उन्होंने 26 जनवरी 1950 को संविधान सभा में दिए गए भाषण में कहा था कि -
 " हम एक विरोधाभासी जीवन में प्रवेश करने जा रहे हैं। हमारी राजनीति में समानता होगी और हमारे सामाजिक व आर्थिक जीवन में असमानता। राजनीति में हम एक व्यक्ति एक वोट और हर वोट का समान मूल्य के सिद्धांत पर चल रहे होंगे। परंतु अपने सामाजिक एवं आर्थिक जीवन में हमारे सामाजिक एवं आर्थिक ढांचे के कारण हर व्यक्ति एक मूल्य के सिद्धांत को नकार रहे होंगे। इस विरोधाभासी जीवन को हम कब तक जीते रहेंगे? कब तक हम अपने सामाजिक और आर्थिक जीवन में समानता को नकारते रहेंगे? यदि हम इसे नकारना जारी रखते हैं तो हम केवल अपने राजनीतिक प्रजातंत्र को संकट में डाल रहे होंगे। हमें जितनी जल्दी हो सके, इस विरोधाभास को समाप्त करना होगा, अन्यथा जो लोग इस असमानता से पीड़ित हैं, वे उस राजनीतिक प्रजातंत्र को उखाड़ फेंकेंगे, जिसे इस सभा ने इतने परिश्रम से खड़ा किया है।'
 आर्थिक असमानता तो समाज में नया स्तरीकरण कर रहा है। हर समुदाय में इस असमानता को लेकर आक्रोश पनप रहा है। करीब 31 मिलियन व्यक्ति इस देश में बेरोजगार हैं। सोचना चाहिए कि कब तक बेरोजगारी भत्ता देकर उन्हें बरगलाया जा सकता है। यह महाविस्फोटक स्थिति बन रही है। दलित और पिछड़ों को दिए गए आरक्षण का कुछ लोग विरोध करते हैं। लेकिन सच्चाई यह है कि आरक्षण का लाभ अभी दिखना शुरू हुआ है। मैं ज्यादा दूर नहीं, इसके लिए भी अपने गांव की ही पड़ताल करता हूं। शायद यह सही रहेगा। तो मेरे गांव में एक दलित युवा सरकारी जॉब करता है। एक दूसरा है जो प्राइवेट कंपनी में काम करता है। बाकी पूरा दलित समुदाय मजदूरी। उनसे बात कीजिए तो पता चलता है अब उनमें आगे बढ़ने और बराबरी करने के सपने का जन्म होना शुरू हुआ है। बच्चों में कुपोषण जैसी समस्याएं तो हैं ही।

इन सब समस्याओं ने मिलकर लोकतंत्र काे एक गंभीर संकट में फंसा दिया है। जिस तरह अचानक इतने सारे लोग सड़क पर उतर आते हैं, यह संकट की गंभीरता को उभारता है। सड़कों पर उतरने की यह पहली घटना नहीं है। ऊपर से अलग-अलग वजहें नजर आती हैं लेकिन सबके मूल में एक ही है। आर्थिक और सामाजिक असमानता।
 ज्यां द्रेज अपनी किताब "भारतीय नीतियों का समाजिक पक्ष' में लिखते हैं -
भारतीय लोकतंत्र बहिष्करण और अभिजनवाद के दुष्चक्र में फंस गया है। आबादी के उएक बड़े वंचित समूह को लोकतांत्रिक राजनीति की सक्रिय भागीदारी से बाहर रखा गया है। उनकी आकांक्षाएं और प्राथमिकताएं लोक नीति में परिलक्षित नहीं होतीं। लाेक नीति के अभिजनवादी उन्मुखीकरण और एक के बाद एक वंचना  कायम होने से (गरीबी, भूख, अशिक्षा और भेदभाव आदि) लोग असमर्थ हो जाते हैं।

आखिर में इतना ही कहना है कि जितनी जल्दी हो सके इसे बदल देना चाहिए। वरना देर हो जाएगी। लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए गोरखनाथ पांडेय की कविता की यह लाइन और बात खत्म-
 ये आँखें हैं तुम्हारी
तकलीफ का उमड़ता हुआ समुंदर
इस दुनिया को
जितनी जल्दी हो बदल देना चाहिए

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