सोशल मीडिया और हम

फेसबुक ढ़ेर सारे कुओं का समूह है| जिसमें दो चार सौ या हजार मेढ़कों के समूह रहते हैं| हम कुछ लिखते हैं तो उस पर कुछ सौ मेढ़क हां में हैं मिलाते हुए टरटराते हैं| इस तरह हम फ्रैंड लिस्ट में शामिल कुछ हजार या सौ वर्चुअल फ्रैंड्स को सोशल मीडिया का पर्याय समझ लेते हैं| यहां आलोचना न तो खोजे मिलती है और न ही कोई इसे बर्दास्त ही करता है| मैैं टेक्निकल एक्सपर्ट नहीं हूं लेकिन अहसास होता है कि फेसबुक के लॉगरिदम में ही यह फीड है| जो जिस तरह के विचार व्यक्त करेगा उसे उसी तरह का कंटेंट दिखेगा| फेसबुक चलाते हुए यह अहसास होता है कि जो हम लिख रहे हैं उससे हाहाकार मच गया| लेकिन उसे पढ़ा कितने लोगों ने ... दो चार सौ लोगों ने| इससे ज्यादा तो गांधी बिना सोशल मीडिया के कर देते थे| वर्धा में बैठकर चंपारण की खबर रखते थे| एक लेख लिखते थे जिसकी धमक लंदन तक होती थी|
जिस कंटेट को हम सोशल मीडिया पर वायरल होना कहते हैं सोचिए कितने लोग उसे शेयर/लाइक करते हैं ? अधिकतम पचास हजार या एक लाख तक| लेकिन फेसबुक यूजर की संख्या कितनी है - भारत में लगभग 25 करोड़ और विश्व में 220 करोड़| अब भारत को ही लीजिए तो 25 करोड़ यूजर में सिर्फ 40-50 हजार ने शेयर किया |
आपकी पांच हजार की फ्रैंड लिस्ट में लाइक - कमेंट कितने लोग करते हैं - सौ- दौ सौ लोग| ऐसा नहीं है कि वो जानबूझकर नहीं करते| उन्हें दिखता ही नहीं| आप अनफॉलो कर दीजिए किसी को फिर देखिए| फॉलो नहीं करेंगे तो एक भी पोस्ट बमुश्किल दिखेगी|
हमें सोचना चाहिए कि जिसे हम ग्लोबल प्लेटफॉर्म समझते हैं क्या वास्तव में वह ग्लोबल बनाता है या समेटने का काम करता है ! हमारी - आपकी फ्रैंड लिस्ट में कितने दक्षिण भारत या नार्थ ईस्ट के लोग हैं ! जो हैं - उनसे कितनी रेगुलर चर्चा होती है ! मेरा विचार है कि .1%  भी मुश्किल से ऐसा होगा|
न तो जमीनी समस्याओं पर चर्चा है और न ही किसी विरोध का कोई अंजाम ही निकलता है| बस कुछ चुटफुट विचार कौंधे और हम सार्वजनिक कर देते हैं| यह एक तरह से विचारों के भ्रूंण का गर्भपात जैसा होता है| प्रौढ़ होने से पहले उसे चौराहे पर रखकर मार देने जैसा|
कभी- कभी मैं सोचता हूं कि जिस तरह सोशल मीडिया ने सड़क पर उतर कर प्रतिरोध करने की क्षमता को कमजोर किया है| इसे सत्ता में बैठे लोग हथियार बना लें या सही तरीके से समझ लें तो क्या होगा ? मेरे ख्याल से उनको कोई खतरा नहीं रह जाएगा| सोशल मीडिया पर कोई बतंगड उछालकर उलझा देंगे और अपनी मर्जा करते रहेंगे| शायद वे ऐसा कर भी रहे हैं| हर दिन कुछ न कुछ नया सिगूफा रहता है| धर्म- जाति तो कभी कुछ|
दूसरी महत्वपूण बात ये है -  उन्हें समझ में आ जाए कि सोशल मीडिया का विरोध उनके लिए कोई खतरा नहीं तो ! तो क्या वे इस पर मच रही हाहाकार को भाव ही नहीं देंगे| क्योंकि इस पर एक बड़ा वर्ग अनुपस्थित है|
फेसबुक पर मैनें फ्रैंड लिस्ट में शामिल लगभग सभी को अनफॉलो कर दिया| इसके बाद नतीजा हुआ कि अब उन लोगों का लिखा भी दिखना बंद हो गया जिनका हमेशा दिखता था|

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