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क्रोध के कितने रंग

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 गुस्सा जीव का एक स्वाभाविक भाव है। आम तौर पर हर किसी का गुस्सा एक सा ही दिखता है। लेकिन असलियत में यह अपने भीतर कई सारे रंग और वजहें समेटे हुए होता है। गुस्से को हानिकारक मानने की एक सामान्य सी धारणा है।मानोविज्ञान की प्रोफेसर लीजा फील्डमैन का यह लेख गुस्से या क्रोध की कई सारी परतें खोलता है। गुस्से पर प्रियदर्शन की एक कविता की कुछ पंक्तियां हैं- जो इसके सबसे अधिक दिखने वाले लक्षण को बयां करती हैं।

बहुत सारी चीज़ों पर आता है गुस्सा / सबकुछ तोड़फोड़ देने, तहस-नहस कर देने की 
एक आदिम इच्छा उबलती है/ जिस पर विवेक धीरे-धीरे डालता है ठंडा पानी
कुछ देर बचा रहता है धुआं इस गुस्से का / तुम बेचैन से भटकते हो,
देखते हुए कि दुनिया कितनी ग़लत है, ज़िंदगी कितनी बेमानी



लिसा फील्डमैन बैरट --------------------------
कड़वाहट, द्वेष और रोष। गुस्से की असंख्य किस्में हैं। कुछ हल्की होती हैं और कुछ रुखे और शक्तिशाली जैसे कि प्रचंड क्रोध। भिन्न भिन्न गुस्से की तीव्रता के साथ उद्देश्य भी अलग-अलग होते हैं। यह चीखते हुए बच्चे पर सामान्य उत्तेजना के रूप में होता है और राजनीतिक प्रतिद्वंदी से घृणा के रूप में। …

एंटी फासिज्म सिर्फ आतंकित कर सकता है , दक्षिणपंथी लोकप्रियतावाद को रोकना इसके बस की बात नहीं

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स्लावोज़ ज़ीज़ेक
काल मार्क्स के उस फारमूले पर पर दोबारा सोचने की जरूरत है, जिसमें वे धर्म को अफीम बताते हैं। यह सत्य है कि कट्‌टरपंथी इस्लाम धर्म के अफीम जैसा होने का उदाहरण पेश करता है। यह कुछ फंडामेंटलिस्ट मुस्लिमों को अपने वैचारिक स्वप्न में रहते हुए पूंजीवादी आधुनिकता के साथ झूठे टकराव की इजाजत देता है। ऐसे में जबकि कई इस्लामिक देश वैश्विक पूंजीवाद की वजह से तबाह हो रहे हैं।  ठीक इसी तरह ईसाई कट्‌टरता भी है। हालांकि इस समय पश्चिम में अफीम के दो वर्जन हैं, 'अफीम और लोग'।

जैसा कि लारेंट सटर ने इस दिखाया कि रसायन विज्ञान हमारे जीवन का अभिन्न हिस्सा बन रहा है। हमारी जिंदगी के बड़े हिस्से भावनाओं आदि का प्रबंधन नींद की गोलियों, एंटी डिपेंडेंट्स से लेकर हार्ड नार्कोटिक्स से होता है। अब हम सिर्फ सामाजिक शक्तियों से ही नहीं घिरे हैं। हमारी बहुत सी भावनाएं केमिकल सेमुलेशन से आउट सोर्स होती हैं। यह रासायनिक हस्तक्षेप दोगुना हुआ है और काफी विरोधाभासी भी। एक तरफ हम ड्रग का उपयोग बाह्य उत्तेजना आदि को नियंत्रित करने के लिए करते हैं दूसरी तरफ अवसादग्रस्तता और इच्छा की कमी, विचेतन और आर्…

तलवार का सिद्धांत (Doctrine of sword )

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 अहिंसा के बारे महात्मा गांधी ने पहली बार नहीं कुछ बताया था।  अहिंसा पर बहुत पहले, बहुत कुछ कहा और लिखा जा चुका था। भारतीय उप महाद्वीप के हिंदू दर्शन के उपनिषदों में इसका जिक्र किया गया है। जैन और बौद्ध दर्शन की आधारशिला ही अहिसा की नींव पर टिकी है। पश्चिमी दर्शन में ईसा मसीह ने अहिंसा का सिद्धांत दिया। शायद यह वहां ईशु से पहले ही रहा होगा। उनके बाद क्वेकर्स ने अहिंसा के दर्शन को आगे बढ़ाया। कुल मिलाकर अहिंसा एक सार्वभौमिक और सार्वकालिक दर्शन रहा है। लेकिन यह दार्शनिक किताबों और जीवन का नैतिक सिद्धांत ही बना रहा। अहिंसा के दर्शन में गांधी का योगदान यह है कि उन्होंने इसे राजनीतिक स्वतंत्रता और सामाजिक पुनर्जीवन का हथियार बना दिया। सन 1920 में यंग इंडिया में तलवार का सिद्धांत नाम से लिखे गए इस लेख में उन्होंने अहिंसा को लेकर अपने विचारों को काफी हद तक स्पष्ट किया है-
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पाशविक ताकत वाले शासन के समय में किसी के लिए भी यह विश्वास करना लगभग असंभव है कि कोई क्रूर शासन की सर्वोच्चता को नकार सकता है| इस…