बलात्कार : एक सोच

बलात्कार न तो छोटे कपडों के कारण होता है और न ही सीने पर टी शर्ट या टाप के दरारों से झांकते स्तनों के कारण और हां अकेले घूमने के कारण भी नहीं होता, अगर यह सब कारण होता तो उन दुधमुही बच्चि़यों के साथ रेप न होता, उसके न तो स्तन होता है और न ही वह कामुक दिखती है | रेप एक मानसिक विकृति है, एक दमित मानसिकता है | इस सोच का बीजारोपड़ तभी हो जाता है जब बालक स्त्री और पुरुष फर्क जानना शुरु करता है | घरों मे बालक की पुरुषवादी सोच को खाद पानी दिया जाता है, फिर जब एक बार दमनकारी सोच का पेड़ बन जाता है तो उसे दमन करने और अपना पौरुष दिखाने के लिए स्त्री चाहिए | हमारे आस पास ही ऐसे लोग मिल जायेंगे जो रोड़ पर चलते हुए, बस की भीड़ आदि में हाथों के स्तनों मांसल पिंडों पर छू भर जाने और थोड़े से अंत: वस्त्रों या झांकते शरीर के किसी हिस्से के दिख भर जाने से मुदित हो जाते हैं मानो क्या दिख गया | अरे भाई शरीर और वस्त्र ही है आपका भी तो दिखता है | कुछ तो नोच खाने वाली मानसिकता का प्रदर्शन कुछ इस तरह करते हैं - यार वो जो जा रही ना एक बार मिल जाये ना ******पता नहीं क्या कर दूं,
इस तरह से जहर बुझी नजरों वाले हर जगह फैले हैं, इनसे पुलिस या सिर्फ कानून से नहीं निपटा जा सकता | इसकी शुरुआत घर से करनी होगी और तभी से जब बच्चा पैदा होता है | उसके कान में पहला शब्द समानता का पड़ना चाहिए |

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