फूलों का जनाज़ा निकलते देखा |




अब तक मैंने फूलों को जनाज़े पर था चढ़ते था देखा,
कल मैनें फूलों का जनाज़ा निकलते देखा |
एक बार फिर से धर्म के नाम से इंसानियत का  दम घुटते देखा,

कल मैनें इस जहां को रोशन करने वाले चराग़ो को बुझते देखा |
किसी की उम्मीद, लाठी, और किसी घर के चिराग को बिखरते, टूटते औ बुझाते देखा,
सूने आँगन, सूनी गलियां सबकुछ रोते  बिलखते देखा |

कल मैंने फूलों का जनाज़ा निकलते देखा ....

कल तक जिस दीनी तालीमों के किताबों की दी जाती थी दुहाई,
उसे खून के छीटों से सनते देखा,
 एक बार फिर से गोलियों  की गूँज में बचपन की मासूमियत को गुम होते देखा |
कल तक जिन फिजाओं में घुलती थी महक, खिलखिलाहट, उमंग, उल्लास की,
उस पर सिसकियों सन्नाटों की गंध को तारी होते देखा |

कल मैंने फूलों का जनाज़ा निकलते देखा ....

कल तक माओं को  बस्ते टिफिन था भरते देखा,
आज उन हाथों को जनाज़ा सजाते देखा, |
कल तक जिन आँखों में थी उम्मीद और आशाएं,
उनमें आंसू और नैराश्य के बादल को छाते देखा |

कल हमनें फूलों का जनाज़ा निकलते देखा ......



#यायावर_प्रवीण

(मेरे द्वारा उन तमाम बच्चों को श्रद्धांजली देनें का एक छोटा सा प्रयास है जो हर साल आतंक की भेंट चढ़ जाते हैं )
    ( यह मेरी अभिव्यक्ति  कविता के रूप में  पेशावर हत्याकांड  के दिन हुई थी )      

टिप्पणियाँ

  1. " फूलों का जनाजा निकलते देखा... "
    वाह प्रवीण भाई !!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!

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