मकरसंक्रांति : अनेकता में एकता का जश्न


बचपन के वो दिन याद आते हैं जब मकरसंक्रांति के महीनों पहले से ही गांव में तैयारी आरंभ हो जाती थी | हर घर में लाई बनाने के लिए धान का उबालना और सुखाना शुरु हो जाता था, गांव के भड़भूजों के यहां भीड़ बढ़ने लगती थी |  इस गरीब तबके को भी इस त्योहार का  काफी बेसब्री  से इंतजार रहता था, होता भी क्यों न, आखिर यह त्योहार उसके लिए एक अच्छा आमदनी का जरिया जो होता था |

गांव की फिजा में घुल रही गुड़ की महक के बीच तिल भी अपनी खुशबू बिखेर रहा होता था, लोग गुड़ में तिल मिलाकर तिलकुट बनाना  आरंभ कर देते थे |
मकरसंक्रांति का त्योहार भारतीय सभ्यता और संस्कृति से इस कदर जुड़ाव रखता है कि इसके बिना कल्पना करना संभव नहीं, इसका संबंध मौसम परिवर्तन, कृषि तथा प्रकृति जैसे जीवन के आधारभूत तत्वों से है तो  नैतिकता से भी उतना ही घनिष्ठ सम्बन्ध रखता है यह | इसके माध्यम से अन्न के प्रति आदर प्रकट किया जाता है  ।  यह त्यौहार हिन्दू धर्म के सर्वे भवन्तु सुखिन:  विचार का पूरी तरह से अनुसरण करता है, क्योकि इसमें यह प्रावधान किया गया है की धरती के सभी प्राणियों के लिए दान स्वरुप अन्न निकला जाय । कठोपनिषद में भी कहा गया है की अन्न बहुत पैदा करो वह सभी प्राणियों के लिए हो । 
 इस त्योहार के माध्यम से शिशिर को विदा करते हैं और बसंत ऋतु का स्वागत करते हैं। अगहनी फसलें कट किसानों के घर में आ चुकी होती है और किसान संपन्न हो गया होता, है यह उत्सव इस बात का जश्न होता । 
धर्म हमेशा से ही सामाज के नियंत्रक की भूमिका में रहा है, इस लिए किसी बात को समाज में लागू करने के लिए उसे धर्म से जोड़ दिया जाता रहा है, यह बात मकर संक्रांति में भी लागू होती है, जैसे इसमें तिल, गुड़, उड़द, चावल आदि से बनी चीजें खाना अनिवार्य किया गया है । इसके पीछे वैज्ञानिक तर्क है की माघ माह में भारत में अधिक सर्दी पड़ती है ऐसे में शरीर को गर्म रखने के लिए गर्म तासीर की चीजें खाना लाभकारी है, दूसरा कारण है अधिक सर्दी के  कारण त्वचा शुष्क हो जाती है जिससे की चर्म  रोगों का खतरा बढ़ जाता है, इसलिए तिल का अधिक सेवन करने की सलाह दी जाती है। 
यह त्यौहार इस लिए भी ख़ास है क्योकि यह अलग - अलग नाम, अलग-अलग विधियों से पूरे भारत में मनाया जाता है, लेकिन सभी जगह खाने में गुड़, चावल, उड़द और तिल से बने व्यंजन ही प्रयोग किये जाते है । इसे उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्यप्रदेश आदि में खिचड़ी के नाम से मनाई जाती है तो पंजाब में लोहड़ी, असम या पूर्वोत्तर के राज्यों में बिहू और दक्षिण भारत में पोंगल के नाम से मनाया जाता है ।   
इस प्रकार मकर संक्रांति पूरे देश के अनेकता रूपी  मनकों को एकता के रेशमी धागे में  पिरोने का कार्य करता है । एक बात और जो इसे ख़ास बनाती है वह है इसका सौर पंचांग से मनाया जाना, यह हिन्दू धर्म का एक मात्र त्यौहार है जिसे जिसे सौर कैलेण्डर से मनाया जाता है, जिसके कारण यह प्रतिवर्ष एक निश्चित तारीख को पड़ता है ।    
धीरे - धीरे यह त्यौहार लुप्त हो रहा है, बढ़ते बाजारवाद तथा मंहगाई की मार ने इसे भी नहीं छोड़ा, अब न तो गाँव में गुड़ बनाने की भट्टी रही और न ही लोगों में इसे मनाने की रूचि। अब यह अपने अस्तित्व के लिए संघर्षरत है । ऐसे त्यौहारों का ख़त्म होना चिंता का विषय है, इनमें हमारी संस्कृति और सभ्यता की आत्मा बसती है, ये पर्व हमें अनेक होते  हुए भी एक बनाये रखते हैं ।                           

यायावर प्रवीण 

टिप्पणियाँ

  1. लाई भून्जाती लड़कियों की लड़ाई का कोई वाकया याद है या नही... ?

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  2. हां यार यादों में कैद हैं कुछ लम्हे...

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