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मुट्‌ठी से फिसला हुआ छुट्‌टी का दिन और शाम के कुछ घंटे

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मुट्ठी से जिस तरह रेत सरकती है उसी तरह छूट्‌टी के दिन, दिन फिसल जाता है। सुबह आधे घंटे ज्यादा सोया जाता है। दोपहर को फिर पेट भरने का इंतजाम मुश्किल से। इस तरह एक लंबी नींद लेने के बाद जब आंख खुलती है तो शाम कमरे में आ चुकी होती है। दिन तो रोज के जैसा ही रहता है लेकिन यह शाम थोड़ी तो अलग होती है। गली में कई नए चेहरे नजर आते हैं। जो अन्य दिन कभी नहीं दिखते। बर्फ गोले वाले की घंटी सुनाई पड़ती है। पड़ोसी की प्ले लिस्ट का पता चलता है। यह शाम बहुत ठहराव लिए होती है। जैसे लगता है कि दुनिया को कहीं नहीं जाना है। सब इस शाम की मंद-मंद खुशी में शरीक हैं।

छुट्‌टी की शाम ही पता चलता है कि मुहल्ले में बच्चे भी रहते हैं। अपने मम्मी-पापा की अंगुली पकड़ कर चॉकलेट खरीदने की जिद करते हुए। हमजोलियों के साथ धमाचौकड़ी करते हुए। ये आजाद हो चुके होते हैं दस किलो के बस्ते और गले में फंसी टाई से। हां होमवर्क से अभी भी ये अपना पिंड नहीं छुड़ा पाए होते। लेकिन यह एक से दो घंटे का वक्त इनका अपना जरूर होता है। थोड़ा और बढ़िए तो एक ताजा हवा का झोंका आता है और मन को भिगो कर चला जाता है। यह परफ्यूम की खुशबू होती है। एक बारगी…

ईको रूम है सोशल मीडिया, खत्म कर रहा लोकतांत्रिक सोच

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लोकतांत्रिक व्यवस्था में संवाद और असहमति दो बेहद जरूरी तत्व हैं। इस व्यवस्था की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि इस व्यवस्था में रहने वाले लोग व्यक्तिगत तौर पर कितने लोकतांत्रिक हैं। वे असहमति के स्वर को कितनी जगह देते हैं। सोशल मीडिया पर अपनी बात रखते हुए कई बार विचार आता है कि क्या यह प्लेटफॉर्म हमारे  लोकतांत्रिक विचार को बढाता है ? क्या यह यूजर को दूसरे की असहमति को स्पेस देना सिखाता है ? सोशल मीडिया जब नया नया आया था तो कहा यही गया था कि इससे दुनिया ग्लोबल हो गई। लोग अपनी बात को बगैर काटा छांट कर रख सकेंगे। दुनिया ग्लोबल तो उतनी नहीं हुई, लेकिन लोगों की बात बगैर सेंसर हुए रखी भी जाने लगी।
इसके लोकतांत्रिक होने का पहला मजाक तो डेटा के हेरफेर ने कर दिया। यह बात शत प्रतिशत साबित हो चुकी है। अमेरिका में हुए राष्ट्रपति चुनाव में हस्तक्षेप से लोगों का विचार बदलना हो या फिर ब्रिटेन में चल रहे ब्रेक्जिट जनमत संग्रह में । ऐसी घटनाओं ने इस टेक बेस्ड डेमोक्रेसी की सीमाओं का खुलासा कर दिया है। यह साफ साफ बता रहा है कि सोशल मीडिया बेस्ड डेमोक्रेसी की लगाम किसी और के हाथ में है। यह पूरा मॉडल…

'कविता हमेशा धर्म के विरुद्ध होती है'

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अरबी के प्रसिद्ध आधुनिक कवि अदोनिस पेरिस में स्व निर्वासित नागारिक के रूप में रह रहे हैं। उन्हें अरबी भाषा में गद्य कविता का आविष्कारक माना जाता है। उन्हें लगभग हर बार साहित्य के नोबेल का एक उम्मीदवार माना जाता है। अदोनिस की अरब में लोकप्रियता के बारे में कहा जाता है कि उन्हें हर कोई जानता है। लेकिन वे साल साल 2011 के बाद से वे लगातार सीरिया संघर्ष को लेकर एक विवादस्पद व्यक्तित्व रहे हैं। 2011 की शुरुआत में सीरियाई विद्रोह की शुरुआत के बाद अरबी बुद्धिजीवियों को अदोनिस की टिप्पणी का इंतजार था। न सिर्फ इसलिए कि वे एक बड़े कवि हैं बल्कि वे शियाओं की अलावित शाखा से भी हैं। जिससे कि सीरियाई राष्ट्रपति बशर अल-असद का संबंध है। आखिरकार साल 2016 के जून महीने में अदोनिस ने बसर अल-असद को एक खुला खत लिखा। जिसमें उन्होंने डेमोक्रेटिक ट्रांजिशन का आह्वान किया था। लेकिन तब तक असद शासन 1400 लोगों की हत्या कर चुका था। अदोनिस की इतनी देर से प्रतिक्रिया देने को लेकर भी उनकी काफी आलोचना हुई। 86 वर्षीय अदोनिस ने साल 2016 में ही पैन अरब न्यूजपेपर अल हयात में नियमित कॉलम लिखकर अरब स्प्रिंग की विफलता पर अपने …

बिना स्वतंत्रता के सबसे सुखी होने का ये कैसा भरोसा

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किताब: एक रोमांचक सोवियत रूस यात्रा लेखक: डोमिनीक लापिएर 
यात्रा वृतांत लिखा जाना इतिहास लिखने जैसा है। ऐसा मेरा मानना है। लेकिन इसका दायरा तिथियों और सत्ता पर पर काबिज लोगों की कहानियों से काफी बड़ा होता है। यह संस्कृति, सभ्यता और राजमहलों के एश्वर्य से काफी दूर जीने वालों के बारे में ज्यादा होता है। पिछले महीने हमने बाबा कृष्णनाथ के हिमालयी यात्रा का एक हिस्सा स्पीति में बारिश पढ़ा। अब फ्रैंच पत्रकार डोमिनीक लापिएर का यात्रा वृतांत एक
सोवियत रूस यात्रा। बाबा कृष्णनाथ की स्पीति में बारिश पर अभी कुछ लिखने की स्थिति में नहीं हूं। उसको लेकर भीतर एक यात्रा का दौर चल रहा है। वो पूरा होगा तब लिखा जाएगा। फिलहाल डोमिनीक पर।

डोमिनीक लापिएर की यात्रा के समय उम्र 25 साल थी। उनके साथी फोटो पत्रकार ज्यां पियरे पेद्राजनी की 27 साल। उनके साथ उनकी पत्नियां भी थीं। डोमिनीक और पेद्राजनी की 13000 किलोमीटर की यात्रा  सोवियत यूनियन के समाजिक जीवन की यात्रा है। इस वृतांत को पढ़ने के क्रम में सबसे पहला सवाल आता है, कम्युनिस्ट स्टेट अपने लोगों को दुनिया से काट कर क्यों रखते हैं? इसका जवाब नहीं मिला है अब तक। द…

शब्द और वाक्यों पर क्यों रखें कॉपीराइट !

शब्द और वाक्य पर किसी का कॉपी राइट नहीं होना चाहिए। फेसबुक जैसे सोशल प्लेटफॉर्म पर तो एकदम नहीं। आखिर देवनागरी लिपि का आविष्कार 700-800 ईस्वी में हुआ था और हमारा इसके विकास में क्या योगदान है जो इस माध्ययम से व्यक्त की गई अपनी कुछ अभिव्यक्तियों पर विशेषाधिकार रखते हैं। अक्षरों का क्रम बदल देने से नया शब्द बन जाता है। माना यह एक रचनात्मक काम है लेकिन जो शब्द बन रहा उसमें भी तो हमारा कोई योगदान नहीं है। हमने कितने एकदम से नए शब्द गढ़े जो कि उस पर कॉपीराइट रखें। 
कॉमर्शिल तौर पर लिखें तो स्याही, कागज जैसा खर्च आता है किताब लिखने पर। इसके लिए कॉपीराइट कोई करे तो एक बार सोचा जा सकता है लेकिन फेसबुक स्टेटस के लिए ! हालांकि मैं किसी भी तरह के कॉपीराइट का समर्थन नहीं करता।
रही बात रचनात्मक विचार की तो ...कई बार दो लोग एकदम कॉपी एक जैसा सोच सकते हैं। जैसे 1869 में साइंस फिक्शन लेखक अमेरिका के एडवर्ड हाले ने 'द ब्रिक मून' में एक कृत्रिम उपग्रह की कल्पना की। जो करीब 100 साल बाद यथार्थ में बदली. एक दूसरा साइंस फिक्शन लिखा गया 1860 के आसपास. जिसमें चांद के बंजर होने की कल्पना थी, विशुद्ध कल्…

गोल रोटियों का हसीन सपना

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खाना बनाते समय सारी रोटी फूलने की सफलता को 'हैप्पीनेस ऑफ द डे' की कैटेगरी में रखा जा सकता है या नहीं ! मेरे ख्याल से यह डिजर्व करता है. रोटी पलटने और फिर उसे गैस चूल्हे की आंच पर रखने का टाइमिंग वैसा ही होता है जैसे पानी में डुबोकर बिस्किट खाना और पुरानी बुलेट का किक मारने से पहले कांटा मिलाना. रोटी में जैसे, जैसे भाप भरती है, वह टू डी से थ्री डी में बदलती है, करेजा भी एकदम गद्गद् होता जाता है. जब तक उसकी भाप नहीं निकली होती, ऐसा लगता है ... बस्स चांद तारे सूरज सब ठहर जाएं और ये यूं ही फूली रहे . लेकिन जिस तरह सूरज का निकलने के बाद डूबना तय है, इस धरती पर जन्म लेने वाले जीव का मरना तय है, उसी तरह तरह फूली हुई रोटी का पिचकना तय है. सूंsssss की आवाज के साथ कहीं न कहीं से छेद हो ही जाता है.
बनाई गई सभी रोटियों का फूलना एक ऐसी दुर्लभ घटना है जो हमारे अब तक पाक कला के एक्सपीरियंस में यदा-कदा हुई है. अक्सर फूली और न फूली रोटियों का अनुपात फिफ्टी-फिफ्टी का होता है.
रोटी का पूरी तरह गोल, जिस तरह अम्मा को बनाना देखा है, वह हमारे लिए अभी भी फैसनेटिंग है. सचिन तेंदुलकर को चौका मारते देखकर …