भारत बंद समर्थकों के ' आरक्षण खत्म' और इसे झूठ बताने का सच

किसी भी मूवमेंट और प्रतिरोध में शामिल सारे लोग पीएचडी नहीं होते| जो कि उन्हें अपनी मांगों की बारीक समझ हो| जिस तरह कई अखबार, चैनल, न्यूज पोर्टल यह खबर लिख और चला रहे हैं कि दलितों के बंद में शामिल लोगों को गुमराह किया गया/पता नहीं था| उन्होंने पूछने पर बताया कि आरक्षण खत्म किया जा रहा है| यह सच है कि उन्हें यह बात विस्तार से पता नहीं होगी| लेकिन ऐसा भी नहीं कि उनकी बात झूठ थी| यह पूरा दलित आक्रोश जो कल सड़कों पर दिखा उसकी जड़ सिर्फ एससी एसटी एक्ट न होकर यूजीसी का हलिया फैसला भी है| जिसमें कहा गया है कि यूजीसी कि आरक्षण यूनिवर्सिटी की जगह विभाग को इकाई मानकर दिया जाए| कि विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में शिक्षक भर्ती के लिए शिक्षण संस्थान की जगह विभागों को यूनिट मानकर आरक्षण रोस्टर निर्धारित किया जाएगा। इस व्यवस्था से शिक्षक भर्ती में आरक्षित पदों की संख्या कम हो जाएगी, क्योंकि जिस विभाग में भी तीन या उससे कम पद हैं, वहां सभी पद अनारक्षित हो जाएंगे।
उदाहरण के तौर पर इलाहाबाद राज्य विश्वविद्यालय की ही बात करें तो वहां 28 अक्तूबर 2017 को स्कूल ऑफ सोशल साइंसेज, ह्यूमैनिटीज एंड इंटरनेशनल स्टडीज के तहत 14 विभागों में शिक्षक भर्ती के लिए विज्ञापन जारी किया गया था। असिस्टेंट प्रोफेसर के 42 पदों के लिए विज्ञापन जारी किया गया है। आरक्षण व्यवस्था विभागवार लागू की गई है। पांच विभागों को छोड़ दें तो बाकी जगह तीन या उससे कम पद हैं। चार विभागों में असिस्टेंट प्रोफेसर के चार-चार पद और एक विभाग में आठ पद हैं, सो चार विभागों में ओबीसी के लिए एक-एक पद और पांचवें विभाग में ओबीसी के लिए दो एवं अनुसूचित जाति के लिए एक पद आरक्षित है। इस तरह कुल सात पद आरक्षित हैं। अगर विश्वविद्यालय को यूनिट मानकर आरक्षण रोस्टर निर्धारित किया गया होता तो ओबीसी के लिए कुल 42 पदों में 27 फीसदी और एससी वर्ग के लिए 21 फीसदी पद आरक्षित होते।
यानी ओबीसी वर्ग के लिए 11 और अनुसूचित जाति के लिए आठ पद आरक्षित होते। इस तरह कुल 19 पद आरक्षित होते लेकिन विभागवार आरक्षण रोस्टर के कारण 12 आरक्षित पद कम हो गए।

यूनिवर्सिटीज और कॉलेजों में अभी भी दलित और पिछड़े समाज के शिक्षक बहुत कम हैं| इस तरह के फैसलों से तो वे पूरी तरह गायब ही हो जाएंगे| जो भी खबर चलाए ... पूरी चलाए| अधूरी खबर क्यों दी जाती है| हां दलितों के जो भी नेता रहे हों, उन्होंने अपनी इस बात को बेहद सटीक कहें या शातिर कहें, तरीके से टॉर्गेट तक पहुंचाया और समझाया| यह उनकी कामयाबी है|
अब सवर्ण प्रभुत्व वाली और सरकार के अंगुलियों पर नाचने वाली मीडिया लकीर पीटती रहे|

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