गांधी का नेहरू को आत्मीय पत्र


महात्मा गांधी का नेहरू को पत्र

13 नवंबर 1945
प्रिय जवाहर

कल हुई बातचीत से मुझे काफी प्रसन्नता हुई। मैं इस बात पर खेद प्रकट करता हूं कि यह विस्तृत नहीं हो सकती थी। मुझे लगता है कि यह एक बार बैठने पर खत्म नहीं हो सकती है। लेकिन हमारे बीच लगातार इस तरह की बैठकों की जरूरत है। मैं अभी इतना सुगठित हूं कि यदि फिजिकली फिट होने के लिए दौडूं तो तुम्हें पीछे छोड़ दूंगा। दो दिन में मैं वापस लौटकर हम बात करेंगे। मैं पहले भी ऐसा किया हूं। यह इसलिए जरूरी है ताकि हम एक दूसरे को और अपने स्टैंड को भी स्पष्ट तरीके से समझ सकें। ऐसे में जब हम एक दूसरे के दिल में बसते हैं, यह मायने नहीं रखता कि एक दूसरे से कितनी दूर रहते हैं। कल हुई बात से यह पता चला है कि हमारे दृष्टिकोण में बहुत अंतर नहीं है।
मैनें क्या समझा है इसके टेस्ट के लिए नीचे लिखा है। कोई विसंगति हो तो मुझे ठीक करें।

1. वास्तविक सवाल - आपके अनुसार मनुष्य में उच्चतम बौद्धिक, आर्थिक, राजनीतिक और नैतिक विकास करने के विचार पर मैं पूरी तरह सहमत हूं।


2.  इसमें सभी को समान अवसर और अधिकार उपलब्ध कराना चाहिए।

3. दूसरे शब्दों में शहर के निवासियों और ग्रामीणों के बीच खाने-पीने, कपड़ों और अन्य रहने की स्थितियों के मानक में समानता होनी चाहिए। इस समानता को हासिल करने के लिए सभी व्यक्तियों को अपनी जरूरत की चीजें जैसे भोजन, कपड़े आदि स्वयं उत्पादन करने में सक्षम होना चाहिए।

4. मनुष्य अकेले रहने के लिए नहीं हुआ है। यह एक समाजिक प्राणी है। जो स्वतंंत्र और आपस में अंतर निर्भर है। कोई किसी और की पीठ पर सवारी नहीं कर सकता। यदि हम जीवन की आधारभूत आवश्यकताओं पर काम करें तो हम इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि समाज की एकता गांवों या ऐसे छोटे समूहों में है जो स्व निर्भर हैं या आपसी सहयोग आधारित हैं।

बापु के आशीर्वाद

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