अन्ना और जनता की बीच की उफ्फ ये दूरी ...

अन्ना हजारे की आज एक तस्वीर दिखी। जिसमें वे तिरंगा लिए मंच पर खड़े हैं। इस तस्वीर में उनके और प्रतिरोध के बाकी साथियों के बीच करीब काफी जगह है। इतनी जगह कि अन्ना को चश्मा लगाने के बाद भी किसी सबसे आगे बैठने वाले व्यक्ति का चेहरा भी साफ सुथरा नजर नहीं आता होगा। इस खाली जगह में कुछ लोग तिरंगा हाथ में लेकर फहरा रहे हैं। शायद ये विश्वासपात्र होंगे। यह सब तो आप भी तस्वीर में देख सकते हैं। शायद अन्ना के आंदोलन में शरीक भी हुए हों। करीब से देखे हों।
अब अपनी बात - अन्ना प्रतिरोध के बाकी साथियों से इतनी दूर होना हमें कुछ जमा नहीं। इस तरह का व्यवहार अन्ना को वैसे ही एलीट सािबत करता है जिस तरह कोई मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री बुलेट प्रूूफ शीशे के पीछे से बोलता है। मैं मनोविज्ञान तो नहीं पढ़ा हूं लेकिन मेरे विचार से यह एक डर की वजह से किया जााता है। यह डर वास्तविक भी हो सकता है और महज फोबिया भी। कोई राजनीति व्यक्ति ऐसा करता है तो उसे इग्नोर कर दिया जाता है। लेकिन जब कोई आंदोलनकारी ऐसा करता है तो दिल में एक हूक सी उठती है। आंदोन का नेता क्या समझता है अपने आप को ? मजलूम और पीड़ित जनता का उद्धारक ? शायद वह अपने इस काम को आम जन पर किया गया अहसान समझता है। नही पता अन्ना हजारे के विचार हैं लेकिन एक बात तो तय है कि वे खुद को बाकी साथियों से अलग या स्पेशल समझते हैं।
हम यह नहीं कहते कि वे गांधी की ही ट्रेन के थर्ड क्लास में चलें। उन्हें जाना चाहिए हवाई जहाज से। लेकिन आंदोलन स्थल पर जो ये जो दूरी है वह सिर्फ भौतिक दूरी भर नहीं है। जब आंदोलन का नेता अपने ही साथियों से अज्ञात डर की वजह से उससे  दूर रहकर बात करेगा तो क्या खाक आंदोलन करेगा। गांधी को तो छोड़िए अन्ना हजारे को तो किसान नेता चौधरी चरण सिंह से ही कुछ सीख लेना चाहिए। चौधरी साहब के वीडियाे यू ट्यूब पर उपलब्ध हैं। किस तरह वे जनता के एकदम करीब बैठकर बातें करते थे। मंच और जनता के बीच हाथ भर का भी फासला नहीं हुआ करता था।
अन्ना हजारे को आजकल जिसे देखिए गाली दे रहा है। लेकिन मैं मानता हूं कि मनुष्य होने की एक शर्त यह भी है - बार बार विश्वास करना। उम्मीदों का दामन न छोड़ना। इस उम्मीद के साथ कि गलत रास्ते पर गया व्यक्ति एक दिन जरूर सही रास्ते पर आएगा। अन्ना हजारे हवाई जहाज में यात्रा करते हैं। उन्हें इसके लिए पैसे कहां से मिलते है, राम लीला मैदान में टेंट गाड़ने के पैसे कौन देता है यह सब सार्वजनिक करना चाहिए। यह सब इसलिए नहीं कि हम उनपर कोई शक कर रहे हैं। बल्कि इसलिए कि लोगों का उनपर विश्वास जम सके। किसी आंदोलनकारी के लिए जनविश्वास बहुत बड़ी पूंजी है। बाकी पिछली बार हार गए थे तो जरूरी नहीं कि हर बार असफल ही होंगे।

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