तलवार का सिद्धांत (Doctrine of sword )

 अहिंसा के बारे महात्मा गांधी ने पहली बार नहीं कुछ बताया था।  अहिंसा पर बहुत पहले, बहुत कुछ कहा और लिखा जा चुका था। भारतीय उप महाद्वीप के हिंदू दर्शन के उपनिषदों में इसका जिक्र किया गया है। जैन और बौद्ध दर्शन की आधारशिला ही अहिसा की नींव पर टिकी है। पश्चिमी दर्शन में ईसा मसीह ने अहिंसा का सिद्धांत दिया। शायद यह वहां ईशु से पहले ही रहा होगा। उनके बाद क्वेकर्स ने अहिंसा के दर्शन को आगे बढ़ाया। कुल मिलाकर अहिंसा एक सार्वभौमिक और सार्वकालिक दर्शन रहा है। लेकिन यह दार्शनिक किताबों और जीवन का नैतिक सिद्धांत ही बना रहा। अहिंसा के दर्शन में गांधी का योगदान यह है कि उन्होंने इसे राजनीतिक स्वतंत्रता और सामाजिक पुनर्जीवन का हथियार बना दिया। सन 1920 में यंग इंडिया में तलवार का सिद्धांत नाम से लिखे गए इस लेख में उन्होंने अहिंसा को लेकर अपने विचारों को काफी हद तक स्पष्ट किया है-
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पाशविक ताकत वाले शासन के समय में किसी के लिए भी यह विश्वास करना लगभग असंभव है कि कोई क्रूर शासन की सर्वोच्चता को नकार सकता है| इसलिए मुझे मुझे गुमनाम चिट्ठियां मिला करती हैं| जिसमें मुझे यह सुझाव दिया जाता है मैं असहयोग के विकास में हस्तक्षेप न करूं| भले ही चाहे लोकप्रिय हिंसा क्यों न फैले| बाकी लोग मेरे पास यह मानकर आते हैं कि मैं गोपनीय तरीके से हिंसा का खड्यंत्र रच रहा हूं| पूछताछ करते हैं कि खुले तौर पर हिंसा की घोषणा करने की कशुभ घड़ी कब आएगी| वे मुझे आश्वस्त करते हैं कि अंग्रेज हिंसा को छोड़ किसी भी चीज के आगे समर्पण नहीं करते| मेरी सूचना के मुताबिक बाकी सभी यह सोचते हैं कि भारत में रहने वाला मैं सबसे नीच दुर्जन पुरुष हूं क्योंकि मैं अपना कभी भी सही आशय नहीं बताता हूं| उनमें तनिक संदेह नहीं है कि ज्यादातर लोगों की तरह मैं भी हिंसा में यकीन रखता हूं| तलवार के सिद्धांत का मानव के बहुसंख्यक हिस्से पर प्रभाव है और असहयोग की सफलता मुख्य रूप से उस दौरान हिंसा की उपस्थिति पर निर्भर करेगी| साथ ही इस बारे में मेरे विचार इसी अनुपात में लोगों को प्रभावित करेंगे| मैं आतुर हूं कि जल्द से जल्द अपने विचार स्पष्टता के साथ बता सकूं|


मेरा ऐसा विश्वास है कि यदि कायरता और हिंसा में से एक विकल्प को चुनना हो तो मैं हिंसा को चुनने की सलाह दूंगा| इसलिए जब मेरे सबसे बड़े बेटे ने पूछा कि सन 1908में जब मुझपर प्राणघातक हमला हुआ था| तब यदि वह वहां उपस्थित रहता तो क्या उसे वहां से मुझे मरता छोड़कर भाग जीना चाहिए था या अपनी शारीरिक शक्ति से विरोध कर सकता था| मैने उससे कहा कि मुझे बचाना उसका एक कर्तव्य था| चाहे भले ही उसे हिंसा का इस्तेमाल क्यों न करना पड़ता| इसलिए मैने बोअर/जुलू युद्ध में हिस्सा लिया| इसलिए वे सभी जो हिंसा में यकीन रखते हैं उनके लिए शस्त्र प्रशिक्षण की मैं वकालत करता हूं| इसलिए मैं चाहूंगा कि भारत अपनी इज्जत बचाने की खातिर शस्त्रों का सहारा ले, बजाय इसके कि कायरता पूर्वक अपना अपमान होते देखे|

इसके बावजूद मेरा मानना है कि अहिंसा, हिंसा से असीम गुना श्रेयस्कर है| क्षमादान, सजा देने से कहीं अधिक मनुष्योचित है| क्षमादान एक सैनिक की शोभा में वृद्धि करता है| लेकिन क्षमादान तभी तक अर्थपूर्ण है जबतक व्यक्ति में दंड देने की शक्ति हो| अन्यथा वह अर्थहीन है| क्योंकि दंड की शक्ति के बिना क्षमा करने से दुर्बल प्राणी प्रतीत होता है जो स्वयं की रक्षा करने में असमर्थ है| एक चूहा शायद ही बिल्ली को क्षमादान दे सके| क्योंकि वह उसके टुकड़े-टुकड़े कर सकती है| इसलिए मैं उन सभी की भावनाओं की सराहना करता हूं जो जनरल डायर और उसके साथियों को सजा देने की मांग करते हैं| यदि वे चाहें तो इनके टुकड़े कर सकते हैं| मैं एक असहाय रचना में विश्वास नहीं करता| मैं चाहता हूं कि मैं भारत और अपनी शक्ति का इस्तेमाल बेहतर उद्देश्य के लिए कर सकूं|

मुझे गलत न समझा जाए| ताकत शारीरिक सामर्थ्य से नहीं आती| वह अदम्य इच्छा शक्ति से आती है| एक औसत जुलू एक औसत अंग्रेज से अधिक निडर होता है| लेकिन वह एक अंग्रेज लड़के से इसलिए दूर भाग जाता है क्योंकि वह उसकी रिवाल्वर या जो शस्त्र लिए होता है, उससे डरता है|  वह व्यक्ति मौत के भय से ग्रसित रहता है| जिसके कारण हष्ट पुष्ट शरीर के बाद भी शक्तिहीन हो जाता है| हम भारत में यह महसूस कर सकते हैं कि एक लाख अंग्रेज तीस करोड़ इंसानों को डरा नहीं सकते| एक निश्चित क्षमादान हमारी शक्ति को मान्यता देगी| क्षमा से हमारे अंदर ताकत की एक प्रचंड लहर आएगी| जिससे कि डायर और फ्रैंक जॉनसन के लिए भारतीयों को अपमानित करना असंभव हो जाएगा| मुझे इस बात का ज्यादा मलाल नहीं है कि इस समय मैं अपनी बात लोगों तक पहुंचा नहीं पा रहा हूं| हम क्रोधित और प्रतिशोध पूर्ण नहीं होकर खुद को ठगा महसूस करते हैं| लेकिन यह कहने से गुरेज नहीं कि भारत सजा देने का अधिकार समाप्त कर काफी कुछ हासिल कर सकता है| हम अच्छा कार्य करें तो दुनिया के सम्मुख रखने का हमारे पास अच्छा मिशन होगा|
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मैं दूरदर्शी नहीं हूं| सिर्फ यह दावा करता हूं कि एक व्यवहारिक आदर्शवादी हूं| अहिंसा का धर्म सिर्फ ॠषियों और साधुओं के लिए नहीं है| यह सामान्य लोगों के लिए भी है| अहिंसा मानव जाति का कानून है जबकि हिंसा पाशविकता का| पशुता/क्रूर में यह भावना सुसुप्त रहती है| वह शारीरिक ताकत के अलावा कुछ नहीं जानता| मानवीय प्रतिष्ठा के लिए जरूरी है कि आत्मा की शक्ति के ऊंचे कानून का पालन किया जाए| मैं इसके लिए प्राचीन भारत के आत्म बलिदान के नियम को सामने रखना चाहूंगा| सत्याग्रह और उसकी शाखाओं के लिए असहयोग आंदोलन जैसे जन प्रतिरोध नए नहीं हैं| इसमें नया यह है कि ये पीड़ा सहने के कानून हैं| जिन महापुरुषों ने हिंसा के बीच रहकर अहिंसा की खोज की थी वे न्यूटन से अधिक प्रतिभाशाली थे| वे व्यक्तगत रूप से वेलिंगटन से बड़े योद्धा थे| चूंकि उन्हें अस्त्रों का उपयोग आता था इसलिए उसकी अनुपयोगिता को महसूस किया| उन्होंने सिखाया कि थके हुए का उद्धार अहिंसा से नहीं हो सकता|

अहिंसा का मतलब यह नहीं कि बुराई करने वाले के सामने घुटने टेक देना| इसकी बजाय पूरी आत्मीय ताकत के साथ अन्याय का विरोध करना| अहिंसा को स्फूर्त रखने का तात्पर्य है सचेत अवस्था में पीड़ा सहना है| अस्तित्व के इस नियम का पालन करते हुए एक अकेले व्यक्ति के लिए भी संभव है कि वह अपने सम्मान, धर्म और आत्मा को बचाने की खातिर अन्यायी सम्राज्य से मुकाबला करे| इस तरह वह अन्यायी सम्राज्य के पतन की नींव रख सकता है और उसके पुर्जीवन का आधार भी| मैं भारत से अहिंसा का अभ्यास करने का अनुरोध इसलिए नहीं कर रहा हूं क्योंकि वह कमजोर है| मैं चाहता हूं वह अपनी शक्ति और ताकत के बारे में जानते हुए इसका अभ्यास करे|भारत को अपनी ताकत महसूस करने के लिए हथियारों के प्रशिक्षण की कोई जरूरत नहीं है| हमें इसकी जरूरत इसलिए महसूस होती है क्योंकि हम खुद को हाड़ मांस के सिवा कुछ भी नहीं समझते| मैं चाहता हूं भारत यह महसूस करे कि उसकी एक आत्मा है जो कभी क्षीण नहीं हो सकती| वह हर शारीरिक कमजोरी पर विजय पाते हुए पूरे विश्व की ताकत का मुकाबला कर सकता है| राम का क्या अर्थ है, वह एक साधारण मानव है जो वानरों के साथ, दुष्ट रावण के खिलाफ मुकाबले को तैयार हो गया| क्या इसका अर्थ आध्यात्मिक शक्ति की शारीरिक ताकत पर विजय नहीं है| बहरहाल मैं तब तक रुक नहीं सकता जब तक भारत राजनीतिक जगत में आध्यात्मिक जीवन की व्यवहारिकता का अनुभव न कर ले| भारत अपने आपको अंग्रेजों की मशीनगनों, टैंक और हवाई जहाजों के सामने शक्तिहीन और पंगु समझता है| वह अपने को कमजोर समझने के कारण असहयोग की बात करता है| यदि लोग समुचित मात्रा में लोग अहिंसा का अभ्यास करें तो यह उन्हें ब्रिटिश अन्याय से मुक्ति दिला सकता है|

मैं असहयोग को सिन फेननिज्म से अलग मानता हूं| क्योंकि ऐसी धारणा है कि इसे हिंसा के साथ प्रस्तावित नहीं किया जा सकता| लेकिन मैं उन स्कूल ऑफ वॉयलेंस को भी आमंत्रित करता हूं कि वे एक बार इस शांति पूर्ण असहयोग को इस्तेमाल करें| यह आंतरिक कमजोरियों की वजह से कभी फेल नहीं होगा| यह असफल होगा तो रिस्पांस के अभाव की वजह से| तब यह समय वास्तव में खतरनाक हो सकता है| महान आत्मा वाले लोग जो राष्ट्रीय अपमान और अधिक नहीं सह सकते, अपने भीतर छिपे आक्रोश को निकालने की चेष्टा करेंगे| वे हिंसा का सहारा लेंगे| जहां तक मैं जानता हूं उन्हें बिना अपने लिए या देश के लिए कुछ किए बगैर समाप्त हो जाना चाहिए| यदि भारत तलवार के सिद्धांत पर चलता है तो क्षणिक विजय प्राप्त कर सकता है| उस वक्त भारत मेरे हृदय का गौरव नहीं हुआ करेगा| मैं भारत से जुड़ा हूं क्योंकि मैने जो भी पाया है इसी से पाया है| मुझे पूर्ण विश्वास है कि भारत का दुनिया के लिए एक मिशन है| भारत को यूरोप का अंधानुकरण नहीं करना चाहिए| भारत का तलवार के सिद्धांत को स्वीकार करना मेरे लिए परीक्षा की घड़ी होगी| मुझे विश्वास है कि ऐसा कभी नहीं होगा| मेरे धर्म की कोई भौगोलिक सीमाएं नहीं हैं| यदि इसमें मेरी आस्था कायम है तो मेरा प्यार बढ़कर भारत को समर्पित हो जाएगा| अहिंसा धर्म के माध्यम से भारत की सेवा के लिए मेरा जीवन समर्पित है| जो कि हिंदू धर्म का मूल है| जो लोग मुझ पर अविश्वास करते हैं, उनसे अनुरोध करता हूं कि जिस संघर्ष की अभी शुरुआत हुई है, उसके कामकाज को हिंसा का बढ़ावा देकर बाधित न करें इस विश्वास में कि मैं भी हिंसा चाहता हूं| मैं गोपनीयता को पाप समझकर उसका विरोध करता हूं| उन्हें अहिंसक असहयोग को एक मौका देना चाहिए| तब उन्हें पता चलेगा कि मेरे मन में कुछ छिपा हुआ नहीं था|
                                                            महात्मा गांधी ( यंग इंडिया, अहमदाबाद, बुधवार 11 अगस्त 1920)

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