नेता भी कुर्ता छोड़ क्यों नहीं पहनते सुर्ख टी शर्ट

एक तरफ हम चाहते हैं देश से वीआईपी कल्चर खत्म हो जाए। दूसरी तरफ कोई नेता रेस्टोरेंट में खाना खा लेता है या मूवी देख लेता है तो गॉसिप का मसाला बन जाता है। नेता भी इंसान होता है। उसकी भी निजी जिंदगी है। फिल्में देखने का मन करता होगा। ट्रैफिक खत्म होने के बाद स्ट्रीट लाइट की पीली रोशनी में टहलना चाहता होगा या गली चौराहे पर बैठकर गप्प करना चाहता होगा। हमें हमेशा ऐसा व्यक्ति क्यों चाहिए जो चमत्कारिक और जिसका जीवन रहस्य में लिपटा हुआ हो। हर चीज जान लेना चाहते हैं आरटीआई लगाकर लेकिन जब कोई बिंदास और खुली किताब सा होता है तो उस पर फिकरे कसे जाते हैं।
नेताओं के ड्रेसिंग सेंस देखकर मुझे ऊब सी लगती है। मैं अक्सर सोचता हूं कि कितना बोरियत भरा होगा कि हर समय एक वे एक ही डिजाइन और रंग के कुर्ते और पायजामें पहना पड़ता है। क्यों नहीं सामान्य लोगों जैसे सुर्ख रंग के टी शर्ट पहनते। क्यों नहीं बसंत के मौसम में सरसो के फूलों जैसे गहरे और चटकीले पीले रंग के शर्ट या टी शर्ट पहना करते। चौराहे पर उतर कर होली खेलते। देश के सारे नेताओं को एक जगह खड़ा कर दिया जाए लगेगा कि किसी शोक सभा में आए हुए हैं।


देश के राष्ट्रपति तो छुट्टियां मनाते हैं लेकिन कहा जाता है कि प्रधानमंत्री पद पर छुटि्टयों का प्रावधान नहीं है। ऐसा क्यों है ? प्रधनमंत्री का भी वर्किंग ऑवर 8 घंटे का ही होना चाहिए। जब यह सैकड़ों रिसर्चों में साबित हो चुका है कि व्यक्ति को एक दिन में 8-9 घंटे से अधिक काम नहीं करना चाहिए। फिर वह 18 या 20 घंटे क्यों का करता है। क्यों न प्रधानमंत्री और उसके मंत्री भी हम लोगों जैसे बकायदे ऑफिस से छुटि्टयां लें और पत्नी-बच्चों को वक्त दें, उनके साथ एंजॉय करें। जब देश का शीर्ष नेतृत्व आम श्रमिकों की तरह काम करेगा तब न आम श्रमिक को महसूस कर पाएगा। हम नहीं चाहते कि प्रधानमंत्री 20 घंटे का करे और हम ऑफिस में 8 घंटे। मंत्रियों को भी सप्ताह में एक दिन वीक ऑफ लेना चाहिए।
जब देश का शीर्ष नेतृत्व और जन प्रतिनिधि सामान्य लोगों की तरह सुबह ऑफिस जाएंगे शाम को पत्नी-बच्चों के साथ घर पर रहेंगे, पहनावे समान्य से होंगे। तभी न सही मायने में बराबरी होगी। वरना तो प्रधानमंत्री या मंत्री बन जाने के बाद उसका पूरा पारिवारिक जीवन चौपट हो जाएगा। फिर इसकी भरपाई वह करप्सन करके धन बनाकर करेगा।

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