स्त्री का अपरिवर्तनशील चेहरा हुसैन की 'गज गामिनी'


स्त्री विमर्श पर फिल्में तो हजारों बन चुकी हैं | उनपर खूब लिखा भी गया है | लेकिन किसी पेंटर के नजरिए से फेमिनिज्म को बहुत कम पर्दे पर उतारा गया है। पिछले दिनों मकबूल फिदा हुसैन की गज गामिनी देखी | गज गामिनी मकबूल फिदा हुसैन की कविता और उसपर बनाई गई पेंटिंग है| जो कि पूरी तरह स्त्री को समर्पित है | हालांकि इसे सिर्फ स्त्री को किया गया ट्रिब्यूट कहना मकबूल के साथ न्याय न होगा | यह फिल्म स्त्री के अलग अलग समय को दर्शाने की ईमानदार कोशिश है जिसमे उसकी एक ही भूमिका है | वह हमेशा से पुरुषों की नजर में मां होती है, बहन, बेटी, प्रेमिका या सुंदरी ही होती है| नहीं होती तो इंसान।
 गज गामिनी ऐसी फिल्म है जिसमें न तो कोई हीरो है, न तो विलेन, बिना किसी प्लाट और स्क्रिप्ट के भी इन सबसे लैस है | यह फिल्म ऐसी स्त्री की कहानी है जिसके चेहरे और भूमिका को पुरुषों द्वारा गढ़ा गया है | उसके ये चेहरे समय से परे हैं | फिल्म में दो सदियों को एक काली दीवार के माध्यम से प्रदर्शित किया गया है | जिसके एक तरफ ज्ञान है ..जिसको कालिदास करते हैं और दूसरी तरफ मतलब दूसरी सदी साइंस ..जिसको की साइंटिस्ट।  पतझड़ के बाद बसंत आ आते आते और जाते रहते हैं लेकिन एक औरत के सिर से अलग अलग भूमिकाओं की गठरी का भार कम नहीं होता।
 बनारस के घाट पर पर गजगामिनी घुंघरू बांधकर नृत्य करती है। इस एब्सट्रैक्ट चित्रण की व्याख्या करें तो घाट, संसार का प्रतिरूप है। जिसपर अलग-अलग समय पर साइंस और अध्यात्म का प्रभुत्व होता है। लेकिन स्त्री वैसे ही घुंघरू के रूप में पैरों में बंधी बेड़ियों में जकड़ी अलग-अलग भूमिकाओं में थिरकती रहती है। वह हर सदी में आधुनिकता के जंगल में भटकती रहती है। वह खुद के अस्तित्व को लेकर भ्रमित रहती है। उसके दुख और भ्रम की स्थिति को मकबूल फिदा हुसैन ने बिना पत्तियों वाले बांस के जंगल से चित्रित किया है। दुख और भ्रम के साथ यह स्त्री की महत्वाकांक्षाओं को भी व्यक्त करता है। यह उसके दुखों और विजडम को भी दिखाता है | वह हर बार खुद को नए सिरे से तलाशती है लेकिन हर बार छली जाती है। पुरुष उसे प्रेम या सफलता और सहानुभूति के जाल में फंसाता है|

 आप अगर गजगामिनी में शुरुआत, अंत या उसका इंटरवल खोजेंगे तो बुरी तरह निराश होंगे। दरअसल गज गामिनी जिंदगी के छोटे छोटे मिनिएचर टेबलेट की तरह है। जो कि जीवन के प्रत्येक स्टेज से जुड़ा होता है | गज गामिनी हिंदुत्व के उस सिद्धांत में गहरा विश्वास भी प्रकट करती है, जिसके तहत स्त्री अलग-अलग समय में मिली भूमिकाओं को बड़ी शिद्दत से निभाती है | वह इसमें इस कदर डूब जाती है कि  उसे अपनी पिछली भूमिका या व्यक्तिगत रुचियों का भान ही नहीं रहता।  यह फिल्म एक औरत की  ऐसी मिस्टिरियस यात्रा है ..जिसका की कोई एक तय चेहरा नहीं है, वह बस अवतार लेती है।
 स्त्री अवतारों की बात करें तो मोनालिसा एक गंभीर विचारक है तो शकुंतला प्रेरक है| वहीं  प्रेमचंद की निर्मल है ..जो कि धनी होने के बावजूद खुद को शोषित मानती है | मोनिका ऐसी दोस्त है जो देखती कुछ भी नहीं पर जानती सब कुछ है | सिंधु फायरब्रांड है ..जिसका बस एक टारगेट है ..बुराई को खत्म करना, जबकि फूल की टोकरी में पिस्टल रखने वाली फुलवानिया ऐसी औरत को प्रेजेंट करती है ..जिसके साथ अन्याय हुआ है और वह उसे खोज रही है। ये सभी कैरेक्टर गंभीर दर्शकों के दिल पर चोट करते हैं और गहरी सहानुभूति बटोरने में कामयाब रहते हैं।
 गजगामिनी में माधुरी दीक्षित के क्लासिकल डांस के आप बिना कायल हुए नहीं रह सकते। शाहरूख खान की भूमिका काफी छोटी लेकिन एनर्जी भरने वाली है। फिल्म देखतेे हुए कई बार महसूस होता है कि कैमरा, एक्टर या म्यूजिक सब कुछ मकबूल फिदा हुसैन के एक एक इशारे पर सांस लेता है। जिस तरह कैनवास पर पेंटिंग करते समय उनका रंग और ब्रश पर पूरी तरह नियंत्रण रहता है उसी तरह फिल्म को भी एक एक स्ट्रोक से सजाया है। इसकी वजह से फिल्म का कोई भी कैरेक्टर जवां नहीं हो पाता। जिसके कारण फिल्म पूरी तरह बिखरी-बिखरी लगती है। फिल्म के दृश्यों का आपस में न जुड़ने जैसी कमी के पीछे दरअसल हुसैन का फिल्मकार न होना है।
 जहां तक म्यूजिक की बात करें तो वह बहुत ही मीठा है। चाहे भूपेन हजारिका और अनुराधा पाल का मेरी पायल हो या फिर भूपेन दा का सोलो ट्रैक गज गामिनी, जो कि फिल्म का टाइटल सांग है। म्यूजिक और रंग ही इस फिल्म को आगे बढ़ाते है। सिनेमेटोग्राफी से लेकर स्क्रिप्ट तक हर जगह एक पेंटर का प्रभाव साफ तौर पर दिखता है। गज गामिनी के निगेटिव पक्षों की बात करें तो इसमें बहुत अधिक एब्सट्रेक्ट या सिम्बल का यूज़ हुआ है, जिसके चलते फिल्म जटिल हो गई   है, उदाहरण के तौर पर औरत के सिर पर भार के तौर पर गठरी या घुंघरुओं के टूटने का मतलब सामान्य दर्शक नहीं समझ पाता। हालांकि इन सब के बावजूद यह स्त्री को ले कर बनने वाली एक खूबसूरत फिल्म है। इसे देखना ऐसे था जैसे प्रेम कविता पढ़ना।

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