महत्वाकांक्षाओं की तड़प और उसकी काव्यात्मक यात्रा

फिल्म: एट फाइव इन ऑफ्टरनून

डायरेक्टर: समीरा मखमलबाफ

अभिनेत्री : अफलेह रेजाई

अफगानिस्तान बैकग्राउंड पर बनी फिल्म एट फाइव इन ऑफटरनून, वहां की बदहाल हालात की छोटी झलक दिखाती है। एट फाइव इन ऑफटरनून अफगानिस्तान से तालिबान शासन के खत्म होने के बाद के हालात पर बनी संभवत: पहली फिल्म है। जो कि दर्शक को काबुल से शुरू होकर दर्शक को एक पोयटिक जर्नी पर ले जाती है। यह यात्रा महिला अधिकारों से होते हुए तालिबान काल के वीरान खंडहरों तक और कहीं इसके आगे जाती है। दर्शक की यह यात्रा सिर्फ गाइड टूर न होकर राजनीतिक रूप से सचेत और सजग होने का संदेश भी देती है।
लेखिका और निर्देशक समीरा मखमलबाफ ने फिल्म की कहानी अपने पिता मोहसिन मखमलबाफ के साथ मिलकर लिखा है। वे फिल्म के सह लेखक हैं। एट फाइव इन ऑफ्टरनून, युवा और बुद्धिमान युवती नाकरेह (अफलेह रेजाई) पर केन्द्रित है। वह अपने कंजर्वेटिव पिता, एक तांगा चालक और असहाय सिस्टर इन लॉ के साथ एक खंडहर में रहती है। वह एकदिन बिना अपने कंजर्वेटिव बाप के बताए काबुल के एक सेक्युलर स्कूल में एडमिशन ले लेती है। जहां नाकरेह को खुलकर बहस करने और दुनिया के बारे में जानने का मौका मिलता है। यह माहौल उसके पैरों से जूते और स्लीपर को हाई हील में बदल देता है। स्कूल का माहौल ऐसा है, जो हर एक गर्ल्स को न सिर्फ सपने देखने की आजादी देता है, बल्कि उन पर एक दूसरे से बहस करने को जोर भी देता है। इस तरह के दिवा स्वप्नों के बीच स्कूल की टीचर क्लॉस की प्रेसिडेंट कैंडीडेट बनने के लिए नाकरेह जैसी लड़कियों को प्रेरित करती है | प्रेसिडेंट कैंडिडेट नाकरेह के कैंपेन को सपोर्ट मिलता है युवा कवि (रजी मोहेबी) का | जो कि पाकिस्तान से लौटा था और रिफ्यूजियों के बीच मिला था नाकरेह से|
अफगानिस्तान की महिला प्रेसिडेंट बनने के मजाक के बीच ..नाकरेह गंभीर होती जाती है अपने पॉलिटिकल करियर को लेकर | वह पाकिस्तान की प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो को अपना रोल मॉडल मानती है | इतना ही नहीं ...नाकरेह के दिमाग में राष्ट्रपति बनकर किए जाने वाले कामों का एक खाका भी है | वह लड़कियों के लिए स्कूल खोलना चाहती है, तालिबानी सोच खत्म करना चाहती है |
फिल्म का एक दृश्य काफी कमाल का है | नाकरेह एक फ्रांसीसी सैनिक से मुखातिब होती है और उससे फ्रांसीसी राष्ट्रपति का शपथ लेते वक्त का भाषण पूछती है और फ्रेंच पॉलिटिक्स पर बातें करती है। जब वह यह कहकर उसकी बातों को इग्नोर करना चाहता है कि ‘हम सैनिक हैं, हमारा काम पॉलिटिकल इंटरफियर नहीं है’ तो वह दृढ़ता और तर्कपूर्ण तरीके से इसे खारिज कर देती है। यह दृश्य साबित करता है कि पॉलिटिक्स सिर्फ निरक्षर ही नहीं पढ़े लिखे लोग भी इग्नोर करते हैं | यह प्रवृत्ति बदलनी चाहिए | हर किसी को राजनीतिक रूप से सजग रहना चाहिए क्योंकि यही हम सबका भविष्य तय करती है | 
कुछ ही समय बाद नाकरेह का छोटा परिवार एक रिफ्यूजी कैंप से दूसरे रिफ्यूजी कैंप में शिफ्ट हो जाता है | नया कैंप एक पार्लियामेंट की इमारत का खंडहर है | जिसे तालिबानियों ने तबाह कर दिया होता है| इसमें लैंडमाइन भी लगे होने का खतरा है।
फिल्म के आखिरी पलों में मखमलबा ने कुछ खूबसूरत और दार्शनिक दृश्य खींचे हैं। जैसे कि युवा कवि, युवती का स्पेनिश कवि लोर्का से परिचय कराता है और उनकी कविता ‘ एट फाइव इन ऑफ्टरनून’ से परिचय कराता है | यह दर्द भरी कविता फिल्म के अंतिम सीन तक चलती रहती है | यह कविता, दकियानूसी परंपराओं और दमनकारी समाज में एक महिला के दर्द को बखूबी उभारने का काम करती है। एकबारगी तो नाकरेह लोर्का की कविता की पात्र येर्मा ही लगती है। जिसका जीवन महत्वाकांक्षाओं की तड़प से भरा हुआ है। नाकरेह सबकुछ बदल देना चाहती है, लेकिन वह बेबस है।
पूरी फिल्म में बूढ़ा बाप बगैर बुरके की महिलाओं को देखने में भी पाप समझता है और उनकी निंदा करता है | लेकिन उसका खामोश और रूखा व्यक्तित्व उस वक्त सबसे अधिक इमोशनल कर जाता है जब वह किसी भी कीमत पर परिवार को रेगिस्तान पार कराने के लिए बीमार घोड़े को हटा खुद बुग्गी खींचने लगता हैं और धीरे-धीरे पूरा परिवार रेगिस्तान में डिजाल्व हो जाता है।











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