#सूरत_डायरी-1

मैं थोड़ी उमस और चिपचिपाहट भरे दिन में कमरे की फर्श पर लेटा हूं। बाहर धूप-छांव का खेल जारी है। ये जुलाई जब भी आती है, किताबें और पुराने झोले झाड़-पोछकर एक बार फिर स्कूल जाने का करने लगता है। हालांकि स्कूल की पढ़ाई से हमेशा छत्तीस का आंकड़ा रहा है। इस नॉस्टाल्जिया से बचने और समय बिताने के लिए मैं किताब के शरण में ..|
यह भी अजीब बात है। आज तक मैं समझ नहीं पाया कि किताब मेरे लिए टाइम पास है या नशा | एक खत्म कर दूसरी की जरूरत महसूस होने लगती है। खैर ...इस धूप-छांव वाले इस दिन में, जब बाहर से बहुत-धीमे-धीमे कौए या किसी गाड़ी के हॉर्न की आवाज भर आ रही है..बाकी सन्नाटा | मैं फ्रेंच पेट्रिक की किताब ' तिब्बत-तिब्बत' पढ़ते वक्त खूबसूरत लाल मिट्टी वाली भूमि पर काल्पनिक रूप से टहल रहा हूं। जिसे कॉमरेड माओ त्से तुंग जेडांग के लाल सैनिकों ने बराबरी लाने की सनक में खून से रंग दिया। हालांकि पेट्रिक लिखते हैं कि यह गुलाम तो 1720 में ही हो गया था। जब छठे लामा की हत्या के बाद सातवें लामा को पकड़कर कासंगी सम्राट ने पोटाला भेज दिया। और उनकी भूमिका महज काठ के उल्लू की रह गई।
पेट्रिक किताब में एक ऐसे परिवार की कहानी सुनाते हैं, जो 1950 में लाल सेना द्वारा तिब्बत अौर तिब्बतियों के दमन के समय पूरी तरह बिखर जाता है। बेटे और बेटियां अमेरिका भाग जाते हैं और बूढ़ा बाप शरण लेने के भारत आने का प्रयास करता है। इस चक्कर में नेपाल में पकड़ लिया जाता है और उसे 18 साल जेल की कठोर यातना सहनी पड़ती है। चीन में  घोर अमानवियता का यह दौर माओ के मरने तक रहा। ये सब पढ़ते वक्त बार-बार मैं खुद सवाल कर रहा था कि यह किस तरह की बराबरी लाने की सनक थी। तिब्बतियाें को उनके घर से निकाल, मठों को उजाड़ उसे हान जाति वालों को दे देना। क्या यह नई गैर बराबरी नहीं थी। इस क्रूर इतिहास को पढ़ने के बीच दो तीन बार फेसबुक भी देखा | पता चला कि यूपी विधानसभा में बम रखा गया था| यूपी सरकार ने एजुकेशन बजट घटा दिया। बहुत कुछ आसपास हो रहा है। जैसे तिब्बत गुलाम हो रहा था तो दुनिया में बहुत कुछ और भी घट रहा था। असद जैदी ने लिखा इंसानियत के फरिश्ते कवि कुंवर नारायण को ब्रेन हैमरेज हुआ है| दुआओ की जरूरत है | यह खबर पढ़ दिमाग थोड़ी देर सुन्न रहा | मैं एक और व्यक्ति से नहीं मिल पाऊंगा कभी? अभी उनकीकविता संग्रह थोड़ा ही पढ़ पाए हैं | पाए हैं मतलब इतने मतलब निकलते हैं कि आगे ही नहीं बढ़ती। इतनी घोर राजनीतिक कविताएं विरले ही मिलती हैं। इन्हीं सब के बीच झूल रहा था कि आफिस का वक्त भी चीखने लगा। उसने कहा .. कीबोर्ड इंजार कर रहा है, अब दूसरी दुनिया में प्रवेश करो।


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