खाली प्लेट जैसा

हर नया दिन

होता है खाली प्लेट जैसा

जिसमें दिखता है

उदास, धुंधला

खुद का अक्स 

 परोसता हूं उसपर दाल भात

 

दाल में कभी नमक ज्यादा कभी हल्दी
दोनो को साधने की कोशिश
रोज होती है, हो रही है
जैसे मेड़ पर चलाना साइकिल

 

कर देता हूं एक एक चावल बीन,
जीभ से चाट प्लेट 

पहले से अधिक चमाचम
लेकिन यह चमक तब तक है,
जब तक उसमें,
दाल-भात की नमी

बनाता हूं अंगुलियों से
मन के खुरापातों की
तस्वीर प्लेट पर,


रोज की तरह
तब तक फिसल कर,
हाथ से गिर गई प्लेट
छन्न की आवाज करके,
जैसे दिन बीत जाता है धीरे से
बाद फिर मचती है हाय-तौबा


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