पहली रोटी

आदिम मानव के मन में पहली बार रोटी बनाने का आईडिया आना कितना गजब रहा होगा | मुझे विश्वास है कि यह विचार किसी स्त्री का ही रहा होगा | वह बैठी होगी किसी रोज ..अकेली या अपने बच्चों के साथ गुफा में और बिजली की तरह कौंध उठा होगा रोटी का ख्याल ..|

कितनी बार उसने अपनी अंगुलियां जलाई होंगी पहली रोटी सेंकने के चक्कर में | ...तब बनी होगी संसार की पहली रोटी ..| वह उछल पड़ी होगी रोटी को देखकर | शाम को जब पुरुष दिन भर की आखेट के बाद घर आया होगा और रोटी की महक नथुनों में गई होगी... तो रोम रोम तृप्त हो गया होगा उसका |

उस रात वह खुले आसमान के नींचे चांद की रोशनी में - झांका होगा स्त्री की झील सी आंखों में, प्यार किया होगा, सहलाया होगा जली अंगुलियों को | लेकिन उस वक्त नहीं सोचा होगा उसने कि ...यही रोटी बनाने की कला कभी स्त्री होने की निशानी बन जाएगी|

रोटी बनाना स्त्री होने जैसा है | आज की नहीं ..वह पहली रोटी बनाने वाली स्त्री जैसा | हमें लगता है रोटी उतनी ही गोल बनती है और अच्छी फूलती है ..बनाने वाले में स्त्रित्व जितना अधिक होता है | रोटी में ममत्व है, पोषण है, प्यार है, | स्त्री और रोटी एक दूसरे के पर्याय हैं |

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