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September, 2016 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

हम वहीं खड़े हैं

मसरूफियत के जिस चौराहे पर खड़े हो तुम उसके ठीक पीछे दो फर्लांग की दूरी पर मेरे हसीन ख्वाबों की झील है जिसमें तैराता हूं तुम्हारे नाम की नावें दुनिया से बेफिक्र होकर कुछ लोग इसे मेरा पालपन समझते हैं औऱ कुछ तुम्हें बदनाम करनें की साजिश लेकिन हैरान तो मैं इस पर हूं मेरे इस कारनामे को न तो पागलपन समझती हो ना ही कोई साजिश बस खड़ी हो उसी मसरूफियत के चौराहे पर जहां पहली बार मिले थे




पहली रोटी

आदिम मानव के मन में पहली बार रोटी बनाने का आईडिया आना कितना गजब रहा होगा | मुझे विश्वास है कि यह विचार किसी स्त्री का ही रहा होगा | वह बैठी होगी किसी रोज ..अकेली या अपने बच्चों के साथ गुफा में और बिजली की तरह कौंध उठा होगा रोटी का ख्याल ..| कितनी बार उसने अपनी अंगुलियां जलाई होंगी पहली रोटी सेंकने के चक्कर में | ...तब बनी होगी संसार की पहली रोटी ..| वह उछल पड़ी होगी रोटी को देखकर | शाम को जब पुरुष दिन भर की आखेट के बाद घर आया होगा और रोटी की महक नथुनों में गई होगी... तो रोम रोम तृप्त हो गया होगा उसका | उस रात वह खुले आसमान के नींचे चांद की रोशनी में - झांका होगा स्त्री की झील सी आंखों में, प्यार किया होगा, सहलाया होगा जली अंगुलियों को | लेकिन उस वक्त नहीं सोचा होगा उसने कि ...यही रोटी बनाने की कला कभी स्त्री होने की निशानी बन जाएगी| रोटी बनाना स्त्री होने जैसा है | आज की नहीं ..वह पहली रोटी बनाने वाली स्त्री जैसा | हमें लगता है रोटी उतनी ही गोल बनती है और अच्छी फूलती है ..बनाने वाले में स्त्रित्व जितना अधिक होता है | रोटी में ममत्व है, पोषण है, प्यार है, | स्त्री और रोटी एक दूसरे…

क्रांतिकारी कलाकार पवेल कूजेंस्की की कूची

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पोलैंड के क्रांतिकारी कलाकार पवेल कूजेंस्की (Paweł Kuczyński) अपनी कूची से आधुनिक समाज की विडंबनाओं के यथार्थ को उकेरते हैं। इनके इलस्ट्रेशन सिर पर हथौड़ा मारने के बजाय सूई की नोक की तरह चुभते हैं।


Water conservation



 Career ladder



कौन थी वह...

तीखे नयन नख्श, दुबली-काया और उस पर काले रंग का मैला सा लंहगा।  लंबाई करीब 5 फुट । ऐसी ही थी वह नौयौवना जो लोगों की तीखी निगाहों से बेखबर, चाय की थड़ी पर बैठ अपने चेहरे का रंग-रोगन कर रही थी। उसके पास मेक-अप किट के तौर पर एक बड़ा सा झोला था। जिसमें एक आइना, लाइनर, लिपिस्टिक और ठूंसे हुए कुछ कपड़े थे। 
वह मेकअप के बीच-बीच में तरह-तरह की भावभंगिमा बनाते हुए सेल्फी भी ले रही थी। लेकिन मोबाइल पर गौर करने पर पता चला कि वह तो नोकिया 1200 था। यह सब कई घंटों से चल रहा था। लोग आते, चाय पीते, उसपर भी नजरें फेेंकते और कुछ पल में ही अपने अपने सफर पर निकल जाते।  युवती अब भी उतनी ही बेखबर थी जितना एक घंटे पहले थी ...लेकिन अब लोगों के मन में कीड़े ने काटना शुरू कर दिया था। एक अधेड़ व्यक्ति ने अपने अनुभव का सर्टीफिकेट लगाते हुए कहा... ये सब ऐसे ही होती हैं...इन्हें ग्राहक चाहिए, तो दूसरे नें थोड़ा खीस निपोरते, पैरों से मिट्टी कुरेदते हुए सिगूफा छोड़ा ... 'है तो जवान'.. करीब करीब सभी इसी तरह की मिलती जुलती अपनी राय सार्वजनिक कर चुके थे ..बस रह गया था तो चाय वाला। एक दो लोगों ने उसकी भी राय लेनी च…

लुटेरा 'लोक'

कुछ दिनों पहले मुर्गियों से लदे एक ट्रक के पलटने का वीडियो आया था। जिसमें लोगों ने ड्राइवर को बचाने बजाय मुर्गियां लूटना सही समझा। इसे छोड़ दिया जाये तो भी, पिछले साल प्रधानमंत्री के साथ योग कर रहे लोगों नें चटाईयां तक लूट ली थी। अंग्रेजी स्कूलों में पढऩे-लिखने वाले लोगों ने दो-दो, तीन-तीन पर हाथ साफ किया था। इसलिए राहुल गांधी की खाट पंचायत में अगर लोगों नें खटिया लूट भी ली होगी तो कोई अजूबा नहीं है। दरअसल यह हमारे 'लोक' की प्रवृत्ति ही लूटक है।
यहां लोग ट्रेन से पंखे और टोंटियां निकाल ले जाते हैं, बाढ़ में भोजन के पैकेट के लूट लेते हैं, मौका पाते ही प्राइमरी स्कूलों में लगे बल्ब और ताले तक नहीं छोड़ते। जो जहां मौका पाता है वहीं अपनी प्रतिभा दिखाता है। लेकिन व्यवस्था पर सब एक जैसे समवेत स्वर में कोसते हैं।
बेशक खुशी मनाईए कांग्रेस की खाट पंचायत के फ्लॉप होने की। क्यों नहीं मनायेंगे,  किसी को टीआरपी मिल रही, किसी की राजनीति चमक रही। पर थोड़ी फुर्सत मिले तो सोचियेगा, लूटने वाला जननेता भी तो इसी जन समूह से आता है ...