जिंदगी और रेगिस्तान

रेत का एक समंदर है मुझमें
जिसमें कहीं कहीं छिटके
नखलिस्तान हैं
उसमें उगे हैं कुछ प्रेम के पौधे
उन्हें हरा भरा रखने को
 पानी चाहिए
वर्षों से भटक रहा हूं
न पानी मिला न बरसात आई
एक दिन नखलिस्तान को
रेगिस्तान निगल लेगा
और मुझे उसमें चलने वाली आंधियां

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