सहिष्णुता का अपना - अपना राग

पिछले दिनों दादरी से उठा सहिष्णुता का सवाल ऐसा गरमाया कि इसकी तपिश में देश के कई प्रमुख मुद्दे झुलस गए। दाल, प्याज और सब्जियों के दाम लगातार ऊंचाईयों के नए रिकार्ड बनाते गए पर इस पर कहीं सुगबुगाहट तक सुनने को नहीं मिली।

पनियाई दाल खाने वाले ने थोड़ी और पानी मिलाया और चुपचाप देश में असहिष्णुता पर उठी बहस को कान टेक कर सुनने का प्रयास करता रहा। रह रह कर अकेल में मुह टेढ़ा करके अहिष्णुता का सही उच्चारण करने का प्रयास भी कर लेता था, पर उससे यह ठीक से कहना नहीं आया।

यह कोई नई बात नहीं, जब ऐसे मुद्दे ने रोटी पानी के मुद्दे को दबाया हो। इसके पहले गाय और मंदिर भी आम आदमी की आवाज को अनसुना करने में अपना योगदान देते रहे हैं | इस बार नया यही रहा कि इसमें हमारे सहित्य की दुनिया के पुरोधा भी कूद पड़े। शायद यही वह बात भी थी, जो राष्ट्रभक्ति के झंडाबदारों को चुभ गई और लगे पाकिस्तान भेजने ।

यह मत सोचिएगा कि सिर्फ इस देश में सिर्फ एक ही झंडाबरदार है, यहां तो सैकड़ों मिलेंगें, कोई कश्मीर के लिए चीर देने को तैयार है, जिसे सिर्फ कश्मीर में आतंक ही दिखाता रहा है तो कोई उस तबके का नेता अपने आपको बता रहा जिसे अभी शहरी जिंदगी की हवा नहीं लगी है।

ऐसा नहीं है कि भारत बहुत आजाद ख्याल देश है। यहां पहले से ही किताबें बैन होती रही हैं। जाने कितनों को अपनी आजाद ख्याली की अनुगूंज छोडक़र जाना पड़ा। इसके उदाहरण दाभोलकर और एम एम कलिबुर्गी है, जिनके बहाने यह शब्द जनता के कानो में गूंजा | इन नामों को छोड़ दिया जाए तो कितने ही लोग छोटी छोटी शिकायतें लेकर आफिसों का चक्कर लगाते फिरते है पर किसी के कान पर जूं नहीं रेंगती | आदिवासियों को पिछडा और माओवादियों का समर्थक कह कर बड़े आसानी से किनारे कर दिया जाता है |

यहाँ कहने को अखबार अपनी बात कहने के लिए फ्री है, पर उसपर भी सुरक्षा के नाम पर अंकुश लगाया जाता है |कभी सेना करती है तो कभी पुलिस, लेकिन हाथ रहता सरकार का ही है| पिछले दिनों तंग आकर विरोध स्वरूप नागालैंड के अखबारों को अपना सम्पादकीय पेज तक खाली छोड़ना पड़ा था | लेकिन इस बात पर चर्चा कहीं नहीं सुनाई पडी |

फिल्मो के लिए सरकार ने अपना एक मोहरा सेंसर बोर्ड बैठा रखा है, जो तय करता है कि कौन सा देश और समाज हित में है। कभी कभी तो लगता है कि अच्छा हुआ कालिदास नहीं रहे नहीं तो, कुमार संभवम् लिखने के बाद उस पर बैन लग जाता और खुजराहो तो गिरा ही दिया जाता।

राष्ट्र भक्ति के झंडाबरदार बात बात पर हल्ला मचाते रहते हैं, कभी पाकिस्तान से क्रिकेट पर तो कभी किसी गायक का कंसर्ट रोक कर धमकी पर। क्या यह अनुदारता नहीं है। किताबें बैन हम करें, फि ल्में सेंसर हम करें
और तो और किसी को सरकार से शिकायत है तो उसे दूसरे देश जाने को हम कहें, और फिर अनुदार देश कह देने पर मिर्ची लग जाए।

दूसरे महानुभाव हैं, इस देश के साहित्यकार । यह बेचारे बैठे बैठे लिखते रहते हैं पर कभी न तो अपने पाठक मिलने की कोशिश करते हैं और न उसके असल मुद्दों से । असहिष्णुता शब्द का उद्घोष सबसे पहले इन्होंने ही किया। सच तो है कि इसका उच्चारण इनके ही बस की बात है, अपन तो अभी भी ठीक से नहीं बोल पाते। इससे मिलता जुलता दूसरा खोज लिए हैं, अनुदार । 

तो साहेबान साहित्यकार लोगों की नींद बहुत गिने चुने विषयों पर टूटती है, उन स्वर्ण दिनों में से यह साल भी होगा। इन्हें अपने कुछ साथी साहित्यकारों की हत्या और कईयों को हत्या की धमकी बहुत खली, पर इनके
साहित्य के विषय गांव के घुरहुआ और फुद्दन कभी नहीं याद आए। उसकी विपन्नता को इन्होने किताब के मोटे जिल्दों में दफन कर दिया, जिसे पढक़र
हम जैसे पढ़ाकू दो बूंद लुढ़ाका लिया करेंगे और फिर से एक क्रांति का स्वप्र संजो लेंगे लेकिन बस थोड़ी देर इन्होने न तो मराठवाड़ा में मर रहे किसानों के लिए कभी सरकार से कोई अपील की, और न तो छत्तीस गढ़ और उड़ीसा के बेघर आदिवासियों के बारे में। गलती इनकी भी नजर नहीं आती इसमें, अब यह क्या करें बेचारे यह भूखे नंगे तो इनकी किताब पढ़ते नहीं। ऐ तो धीरे धीरे मजबूरी मे क से क्लासिनकोव की तरफ बढ़ रहे हैं। फिर इनके लिए कैसी मांग या संवेदना।

एक तीसरा झंडाबरदार भी है, इस देश में, जिसे भोंपू कहें तो गलत नहीं होगा। रोज शाम को बुद्धू बक्से में बैठकर खूब चेहरे पर रंग रोगन करके एक चर्चा सत्र का आयोजन होता है। फिर देखिए यह साहेबान लोग दिल्ली के एसी कमरों से बैठकर भारत पाक जनता के दिलों में छिपी देश भक्ति नापते हैं तो कभी कागज के कुछ पन्नों पर लिखे अंकों के सहारे देश में गरीबी का सही प्रतिशत बताने का दावा करते हैं। इसी नापने की होड़ मे इन्होने इस बार असहिष्णुता शब्द की ऊंचाई और मोटाई भी खूब नापी, बदले में टीआरपी का खेल भी खूब हुआ। इसी चक्कर में इन्होने असहिष्णुता को भोंपू में इतनी जोर से बोला कि, एक बार तो लगने लगा कि देश बन गया सीरिया।

मुझे तो उतनी ही असहिष्णुता नजर आई देश में, जितनी कि मकबूल साहब के एक पेंटिंग के के कारण देश छोड़ते समय थी और सलमान रुश्दी की किताब पर प्रतिबंध करते समय थी। यह अब भी जारी है। वैंडी डोनेगर की किताब बैन की गई, यह तो थोड़ी पुरानी बात हुई, अभी हाल की घटना है कि चरमपंथी संगठन के फंडिंग के ग्राफिक मे सूअर का रेखा चित्र बना देने से एक समुदाय की भावनाएं आहत हो गईं। समझ नहीं आता भावनाएं लोगों की चरमपंथी संगठन की फंडिंग दिखाने से थी या सूअर से। बात बात पर लोग आहत होते रहते हैं।

यहां हर कोई अपने आपनी सहिष्णुता का राग अलापने में लगा है, जबकि सहीमायने में सब मिलकर एक दूसरे की आजादी का गला घोंटने का काम कर रहे हैं। बात का जवाब बात से न देकर डंडे से देने की प्रवृत्ति ने हर किसी के दिमाग में घर कर लिया है। राष्ट्रवादी बात बात पर वामपंथी होने का ठप्पा लगाकर किसी भी बात को गलत साबित करने से नहीं हिचकते तो वामपंथी राष्ट्रवादियों को हिटलर कहकर।

 तीसरे बुद्धू बक्से को एसी कमरों में बैठकर दिल्ली से कश्मीर से लेकर पूर्वोत्तर तक सिर्फ आतंकवाद दिखाता है। न वह वहां के लोगों की संस्कृति से रू-ब-रू करने लायक समझती है और नही हकीकत की समस्याओं को। इसकी नजर
से देखें तो भारत सहित पूरी दुनिया में एक आग लगी है, जहां सब कुछ जल रहा है। इन सबकी सहिष्णुता और असहिष्णुता के शोर में अपने काम की बात को खोज रहाआम आदमीं दूध और दाल में थोड़ा सा और पानी मिलाकर पेट के चूहों को चुप करानें के प्रयास में लगा है।

मुझे सबसे अधिक सहिष्णु तो वही आदमीं लगा। वह जाकर चुप-चाप वोट देता है, फिर पांच साल आंसू लुढक़ाता है, बिना कोई क्रांति का सपना संजोए। लेकिन फिर पांच साल बाद ऐसे ही किसी आदमी को चुनता है जो पिछले से भी बड़ा चोर होता है। बस वह इसी तरह लोकतंत्र की चक्की में घूमते हुए सबका रायता हजम करता रहता है | 

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