चाय की केतली


दोपहर का वक्त,  दिल्ली की गर्मी अपने शबाब पर है |सितंबर का महीना होने के बावजूद बारिस की बूंदें कहीं रूठ सी गई हैं | बादल देखने पर किसी ऐसे रूई के फाहे की तरह लग रहे थे, जैसे वह किसी घायल मजलूम को बस दिखाने के लिए हों, दरद हरने के लिए नहीं |

इस रहस्यमई माहौल में समाचार एजेंसी यूएनआई के गेट के बगल में अधनंगा व्यक्ति चाय और कचौड़ी की दुकान लगाए बैठा था | वह लोगों को चाय समोसे देने के बीच शंका भरे मन से रोड़ के दोनो तरफ नजरें दौड़ाता और फिर अपना काम करने लगता |
सामने नीति आयोग है, जिसमें उसके स्टोव पर खदबदाती चाय से भी गर्म बहसें हो रही होंगी | लेकिन उसे नही पता कि यह नीति आयोग किस चिड़िया का नाम है और यह भी नहीं पता कि यह सड़क देश के सबसे बड़े सदन तक जाती है | उसे पता भी होगा तब भी बन रही नई नीतियों से क्या मतलब | आखिर नीतियां उसके लिए तो बनती नहीं | बनती तो उसके जैसे लोग अपना घर बार छोड़ दिल्ली की झुग्गियों में रहने को विवस न  होते |
रोज बड़े बड़े पत्रकार उसकी चाय की दुकान पर आते हैं | चाय के साथ सरकार की नीतियों पर बहस करते हैं | वह बस सुनता जाता है | उसे चिन्ता तो अपने उस रेहड़ी की ही लगी रहती है | केतली में पक रही चाय के साथ उसकी कई आशाएं और उम्मीदें भी पक रही हैं |
तभी दूर से फिर वही खौफ का पर्याय एनडीएमसी का ट्रक दिखाई पड़ रहा है | जब तक वह हटाने के बारे में सोचता तब तक वह आ चुका था | रोज तो हटा लेता था पर आज जड़ क्यों हो गया | वह बारी बारी से चाय पी रहे तमाम लोगों को देख रहा था, जो रोज बैठकर लंबी लंबी बहसें किया करते थे | तभी उसे अपने स्टोप और केतली का ख्याल आया |
जब तक हटाने के लिए बढ़ा तब तक दोनो जेसीबी के शैतानी पंजों की गिरफ्त मे आ चुके थे | उबलती चाय आधी जमीन पर गिर चुकी थी और आधी जेसीबी के मुह से चू रही थी बूंद बूंद, जैसे उसके आंखों का गर्म पानी चाय की बूंदों में तब्दील हो चुका हो |
जब तक वह फिर से केतली और स्टोप से संबद्ध अपने बिखरे सपनों की दुनिया से वापस आता तब तक कई चाय पीने वाले खिसक चुके थे और कुछ खत्म कर खिसकने की कोशिश कर रहे थे |

वह खामोशी से कभी यूनआई , कभी नीति आयोग की दैत्याकार बिल्डिंग को तो कभी संसद की तरफ जा रही सड़क के विस्तार को  निहार रहा है...


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