एक मुलाकात हजरत गंज से

कल शाम मित्र रोहन तिवारी जी के साथ हजरत गंज घूमने का प्लान बना और निकल लिए यायावरी करने | गजब की रौनक होती है अवध की शाम में, अभी तक सुना ही था कल देखा भी | दुधिया रोशनी में नहाई सड़कें और इस पर लगे एक जैसे लैम्प पोस्ट एक लय बना रहे थे | बीच बीच में दुकानों पर लगे छिटपुट पीले और लाल रंग झालर एकरसता को तोड़ रहे थे |

दोनो लोग पैदल लेन पर बढ़े जा रहे थे बेफिक्र और बीच बीच में तिवारी जी एक मझे हुए गाइड की तरह बताए जा रहे थे, कभी परिवर्तन चौक के बारे में तो कभी लेन की खासियत | लेकिन इन सब के साथ साथ हमारी नजरें काफी हाऊस पर टिकी थी | पता नहीं क्यों पिछले कुछ दिनों से काफी हाऊस काफी आकर्षित करने लगा है, यह पहली बार नहीं थी कॉफी हाऊस देखने की लालसा, अभी इलाहाबाद गया तो वहां भी कॉफी हाऊस गया था |  खैर दोनो लोग उत्तर प्रदेश, अवध को कभी अन्य विषयों पर चर्चा करते हुए कब जीपीओ पहुंच गए पता नहीं चला |

कॉफी हाऊस की तरफ अशोक मार्ग पर मुड़ा ही था कि लेन पर लगी एक बुक स्टाल पर बरबस ही नजर ठहर गई | एक महिला किताबें देने में मशगूल थी, सांवला मेक अप विहीन चेहरा था जिस पर रह रह कर पसीनें की बूंदें लुढ़क रही थी लेकिन चेहरे का ओज अपनी ओर आकर्षित कर रहा था | करीब जाने पर पता चला कि वह जन चेतना संगठन की तरफ से रोज किताबों के साथ साथ पूंजीवादी व्यवस्था के खिलाफ लोगों को जगाती है |
उसके बुक स्टाल में पत्रकार कात्यायनी से लेकर पाब्लो नेरूदा तक की कविताएं थी तो लेनिन, मार्क्स से लेकर भगत सिंह से जुड़े साहित्य तक | वह बड़ी बेबाकी से पूंजी वादी मीडिया और वर्तमान सरकार की मुखालिफत कर रही थी लेकिन सबसे खास बात यह लगी कि उन्होने जिस तरह गणेश शंकर विद्यार्थी को एक पत्रकार के नजरिए से देखा यह आश्चर्यजनक और सुखद लगा |

थोड़ी देर बाद जब उन्हे पता चला कि मै भी मार्क्स के विचारों से कुछ जुड़ाव रखता हूं तो चर्चा लंबी चली लेकिन विषय एक ही रहा मीडिया का कार्पोरेटीकरण | यह होना ही था क्योंकि उन्हे पता चल चुका था कि हम सब मीडिया के छात्र हैं |

 इतनी लंबी चर्चा के बाद पूछने पर उन्होने अपना नाम गीतिका बताया और यह भी बताया कि वे भी मीडिया छात्र रह चुकी हैं लेकिन कोई नौकरी करने से बेहतर उन्हे शहर की चकाचौंध से बे खबर होकर संघर्ष करना लगा |
गीतिका जी का काम और बात चीत के बीच का सामंजस्य बेहद खूबसूरत था | अब तक दो किताबें लेने के बाद भी लग रहा था इसी तरह इसी तरह चर्चा चलती रहे लेकिन समय घड़ी अपना काम कर चुकी थी लेकिन हमें काफी हाऊस जाना था और गीतिका जी का दुकान बंद करने का समय हो चुका था | लेकिन इस वादे के साथ उनसे विदा लिया कि जनचेतना द्वारा काफी हाऊस के तर्ज पर खोले जा रहे एक संस्थान के उद्घाटन समारोह में जुलाई में लखनऊ जरूर आएंगे | दोनो लोगों ने फोन नंबरों का आदान प्रदान किया और हम कॉफी हाऊस की तरफ बढ़ गए|  हांलाकि इसने पूरी तरह निराश किया फिर भी यह अधिक खला नही |

बार बार गीतिका जी द्वारा उठाएगए सवाल मन में चलते रहे लेकिन सच कहें तो अचनाक किसी ऐसे व्यक्तित्व से मिलना बहुत सुखद लगता है | लगा कैसे हो सकता है कोई इतना उर्जाशील व्यक्तित्व वह भी ऐसे कठिन समय में जब लोग वामपंथ के नाम पर नाक भौं सिकोड़ते हैं और गालियां बकते हैं फिर भी अपने लक्ष्य पर अड़िग हैं ...
कुछ इस तरह हजरतगंज से मुलाकात पूरी हुई, लगा बेगम हजरत महल से ही मिल लिए |

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