मौसम के साथ चलें...


मौसम परिवर्तन वैसे तो एक स्वाभाविक प्रक्रिया है लेकिन जब यह परिवर्तन अपने नियत समय पर नहीं होता है तो यह चिंता का विषय बन जाता है। इधर पिछले 10 से 15 वर्षो पर नजर डालें तो हम पाते हैं कि मौसम का परिवर्तन कुछ कुछ असंतुलित हुआ है। गर्मी में बहुत अधिक गर्मी और सर्दी में बहुत अधिक सर्दी पड़ रही है। पूरे एशिया क्षेत्र पर इसकी मार है। कृषि विशेषज्ञ एमएस स्वामीनाथन कहते हैं कि तापमान बढ़ने से सबसे अधिक गेहूं की फसल प्रभावित हो सकती है जिसके कारण खाद्यान्न संकट पैदा हो सकता है। भारत में 64 प्रतिशत जनसंख्या इससे पेट भरती है।
आज मौसम में एक और बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है वह है मौसम का अपने निधारित समय से इतर परिवर्तित होना। जहां पहले अक्टूबर के पहले सप्ताह तक एक मोटे चादर भर की ठंड पड़ने लगती थी वहीं अब यही हालत दिसंबर मध्य तक बनी रहती है। दिसंबर का कड़कड़ाता जाड़ा अब बीते दिनों की बातें हो गई हैं। गर्मी और बरसात के मौसम की भी कुछ ऐसी ही कहानी है। अब सावन में बारिस की पहली फुहार स्वप्न हो चुकी है। मौसम के इस तरह से आगे पीछे होने से कृषि और स्वास्थ्य पर विपरीत असर पड़ा है। एक अनुमान के मुताबिक यदि कृषि को इसके अनुसार नहीं बदला गया तो 2020 तक गेहूं उत्पादन में 6-7 प्रतिशत और आलूू उत्पादन में 3 प्रतिशत की गिरावट आ सकती है।
इसका प्रभाव सिर्फ उत्पादन पर ही नहीं बल्कि फलों की पौष्टिकता पर भी होगा । भारत का विश्व प्रसिध्द बासमती चावल भी प्रभावित होगा। तापमान में वृध्दि से इसकी खुशबू प्रभावित होगी। हर साल मानसून के देर से आने के कारण हजारों एकड़ धान की फसल खराब हो जाती है क्योंकि इसकी रोपाई समय पर नहीं हो पाती है।  इस बदलते मौसम के साथ किसानों को भी ताल मेल बनाकर खेती करनी चाहिए। उन्हें चाहिए कि वे धान की फसल देर से रोपें ।
गेहूं के साथ भी कुछ ऐसी ही समस्या है। ठंड देर से पड़ने के कारण पौधों का समुचित विकास नहीं हो पाता है और उपर से बाद में जल्दी ही कटाई भी जल्दी ही कर ली जाती है। इस समस्या से निपटने के लिए किसानों को अगैती फसलों को बोना चाहिए।
वर्षा के अनियमित होने के कारण भू जल के अधिक दोहन से जलस्तर बहुत तेेजी से नीचे गिर रहा जो कि भविष्य में जल संकट के खतरे की घंटी है। ऐसे में सरकार को कम पानी वाली फसलों के उत्पादन को प्रोत्साहित करना चाहिए।
मौसम में हो रहे बदलाओं को तो रोकना संभव नहीं ऐसे में भारतीय किसानों को ही इसके अनुसार ढ़लना पड़ेगा। नहीं तो हर बार मौसम बेरहम बनकर इनपर टूटता रहेगा।
भारत में मौसम विज्ञान की हालत भी कुछ अजीब ओ गरीब है। यहां पर हवाई यात्राओं के समय मौसम का पूर्वानुमान सटीक तरीके से तो लगाया जाता है लेकिन कृषि के लिए लगाया गया मौसम अनुमान कभी शायद ही सटीक होता हो। ऐसे में कृषक अपनी फसल का बचाव कैसे करें । सरकार को भी चाहिए कि मौसम विज्ञान शाखा को सशक्त बनाए जिससे कि सही भविष्यवाणी हो सके। इस तरह से भारतीय किसान और सरकार को भी मौसम की तरह बदलते रहना चाहिए। 

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