मुस्कराऊँ कैसे...

कल शाम एक तितली
मेरे हाथों पर आ बैठी ऐसे
अपने दिलों का दर्द
बयां करने आई हो जैसे
उसके छुअन का अहसास
मुझे अब तक है
उस मखमली अनुभूति को
मैं बताऊँ कैसेे
गौर से देखा उसकी आंखों में
मायूसी और हजारों दर्द
छिपे हों जैसे
यह देख रहा नहीं गया मुझसे
डरते-डरते पूछा
आज तुम इतनी मायूस कैसे
इतना कहना था कि वह फट पड़ी
अपने दर्द की बाढ़ में
मुझे बहा दिया हो जैसे
वह बोली
मेरे पंखों पंखों को हौले से छूने वाले
हजारों फूल पाकिस्तान से लेकर यमन सीरिया सुडान तक
रोज कुचले जा रहे
दुनिया के गुलों को महकाने वाले
मौत का सामान बनते जा रहे
बताओ ऐसे में खुश रहूं मै कैसे
सीरिया यमन तो दूर की बात है
कितने ही ऐसे बिखरे फूल
तुम्हारे आस-पास हैं
कुछ पेट की ज्वाला बुझाते-बुझाते असमय
जिंदगी की जंग हार जाते हैं
कुछ अच्छी परवरिश और खाद-पानी के अभाव में
खिलने से पहले ही मुरझा जाते हैं
बताओ क्या तुम भी
देखते रहोगे ऐसे

यह बात मेरे दिल को छू गई
सोते हुए आदमी को सूई जैसे चुभ गई
रात में खुले आसमान के नीचे
बैठकर उसकी कही बातों को सोच रहा था
इतने में देखा
आसमान में टिमटिमाते तारों के
आंखों में भी आंसू हों जैसे
फिर वही सवाल मैने दोहराया
भाई तुम सब मायूस क्यों हो ऐसे
उन सब ने जबाब दिया कुछ ऐसे
मुझे देख कर चमकने वाली
हजारों आंखों में आंसू हैं
हर तरफ मौत का मातम है
बमों के धुंए ने आसमान को
 ढक लिया इस कदर
अब हम छोटी चमकीली आंखों को आते मही नजर
अब बताओ मायूस क्यों न हों ऐसे
चारो तरफ मृत्यु तांडव हो रहा ऐसे
फिर भी यू. एन. खामोश है
पूरी दुनिया तमाशबीन क्यों बनी है ऐसे
लोग कहते हैं विश्व ग्लोबल विलेज बन रहा
लेकिन मैं पूछता हूं गांव क्या होते हैं ऐसे
अब तो वसुधैव कुटुम्बकम, विश्व बंधुत्व
सब कुछ फरेब लगने लगा है जैसे
बस सब अपने अपने हित साध रहे
कुछ कुछ लगने लगा है ऐसे

बताओ जहां हर तरफ आंसू, दर्द औ भय हो
वहां हम सब मुस्कराएं कैसे... ||


photo credit-  : REUTERS

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