बेदर्द बारिस

शहरियों के लिए मौसम रोमांस का आया है,
लेकिन गांव के किसानों पर कहर बन के ढ़ाया है,
धरती की गोद में लेटी फसलें देखकर,
किसानों के दिल टूटने का मौसम आया है,
इस बेदर्द बारिस नें
कर्ज में डूबे जाने कितनों को
फांसी पर लटकाया है,
इसनें कईयों के हो रही बंजर
राजनीतिक भूमि को फिर से उपजाऊ बनाया है,
हमनें हर सुबह अखबार को
अन्नदाता की मौतों से रंगा पाया है |

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

गड़रिये का जीवन : सरदार पूर्ण सिंह

तलवार का सिद्धांत (Doctrine of sword )

युद्धरत और धार्मिक जकड़े समाज में महिला की स्थित समझने का क्रैश कोर्स है ‘पेशेंस ऑफ स्टोन’

माचिस की तीलियां सिर्फ आग ही नहीं लगाती...

महत्वाकांक्षाओं की तड़प और उसकी काव्यात्मक यात्रा

महात्मा गांधी का नेहरू को 1945 में लिखा गया पत्र और उसका जवाब

स्त्री का अपरिवर्तनशील चेहरा हुसैन की 'गज गामिनी'

गांधी और सत्याग्रह के प्रति जिज्ञासु बनाती है यह किताब

बलात्कार : एक सोच

समस्याओं के निदान का अड्डा, 'Advice Adda'