पहचान क्यों मिटाएं...

       

हर शहर की अपनी एक सांस्कृतिक विरासत होती है जिस पर वहां के लोग गर्व करते हैं। लेकिन जब इसे धीरे-धीरे मिटा दिया जाता है तो उस शहर की आत्मा भी एक दिन मर  जाती है। बचता है तो बस शोर और इमारतों का ढ़ांचा। पिछले साल हम भी मित्रों के साथ जा पहुंचे आगरा। आगरा देखने की चाहत तब से हिलोरे मार रही थी जब से मैं इतिहास समझने लायक हुआ। मन में बड़ा उत्साह था कि कैसी होगी ताज नगरी, क्या जिस आगरा को अकबर और शाहजहां ने सपनों की भांति संवारा था उस शहर में उनकी भी कोई पहचान होगी।

इन सब सवालों में उलझा हुआ पहुंच गया आगरे का लालकिला देखने। लेकिन दीदार-ए-किला के पहले ही जो कुछ मैने देखा वह बिल्कुल अप्रत्यासित और बेहद चौंकाने वाला था। किले के ठीक सामने जो मूर्ति लगी थी अकबर या शहजहां की नहीं शिवाजी की थी। माना कि शिवाजी ने आगरा विजय किया था लेकिन क्या मुगल सल्तनत के योगदान को भूल जाना चाहिए। मुगलों ने हमें विश्व प्रसिध्द स्थापत्य कला दी। आज हम जिस ताज पर इतराते हैं वह भी उनकी ही देन है जो कि विश्व मानचित्र पर आगरा की भी एक पहचान स्थापित करता है। हम बड़ी आसानी से अपने अतीत को मिटाते हुए देखते रहते हैं। मैं शिवाजी के योगदानों को नकार नहीं रहा। लेकिन शाहजहां के योगदान को भी नहीं भूल सकता।  मुगल सल्तनत ही नहीं हमे तो किसी के भी योगदान को नहीं भूलना चाहिए। चाहे बात मराठा सम्राज्य के योगदान की हो या  आधुनिक भारतीय राजनीति के पुरोधा लोहिया और जयप्रकाश नरायण की। 
  
 आप सोच रहे होंगे कि यहां आगरा, मराठा सम्राज्य और मुगल सल्तनत की बात के बीच लोहिया  क्यों ? वह इस लिए क्योंकि वर्तमान राजनीति में किसी वर्ग विशेष को खुश करके वोट लेने के लिए इस काम को बखूबी अंजाम दिया जाता है। उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने  फैजाबाद से अलग करके एक नया जिला बनाया था। उसका नाम रखा अम्बेडकर नगर। जबकि  अंबेडकर का उस स्थान से कोई लेना देना नहीं था। यह भूमि थी महान समाजवादी नेता लोहिया की । उन्हें एकदम से उपेक्षित कर दिया गया । यहां की मिट्टी में लोहिया के संघर्षो की खुशबू छिपी हुई है। यहां के पिछड़े लोगों के लिए जितना कार्य लोहिया ने किया होगा उतना शायद ही किसी ने किया होगा। लेकिन चंद वोटों के खातिर हमेशा के लिए लोगों के जेहन से लोहिया नाम मिटाने का प्रबंध कर दिया गया। आने वाली पीढ़ी सिर्फ किताबों में ही जान पायेगी कि लोहिया अकबरपुर के पास किसी गांव में पैदा हुए थे।
 यह सिर्फ एक दो घटनाऐं मात्र नहीं हैं । इससे पता चलता है कि बिना सोचे समझे किसी स्थान या शहर की पहचान बदलने का खेल किस तरह खेला जाता है।  अतीत हमारे लिए संजीवनी की भांति होता है । जिससे हम सीखते हैं उस पर गर्व करते हैं वह हमारा पहचान होता है। अतीत पर ही वर्तमान और भविष्य की मजबूत इमारत टिकी है। इसे यादो में संजोकर रखना हमारा फर्ज बनता है।



यायावर प्रवीण

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

युद्धरत और धार्मिक जकड़े समाज में महिला की स्थित समझने का क्रैश कोर्स है ‘पेशेंस ऑफ स्टोन’

महत्वाकांक्षाओं की तड़प और उसकी काव्यात्मक यात्रा

माचिस की तीलियां सिर्फ आग ही नहीं लगाती...

महात्मा गांधी का नेहरू को 1945 में लिखा गया पत्र और उसका जवाब

गड़रिये का जीवन : सरदार पूर्ण सिंह

तलवार का सिद्धांत (Doctrine of sword )

बलात्कार : एक सोच

गांधी और सत्याग्रह के प्रति जिज्ञासु बनाती है यह किताब

समस्याओं के निदान का अड्डा, 'Advice Adda'

दांडी : मैं छूना चाहता था सत्याग्रह की पवित्र जमीन