क्या दुनिया सच में इतनी गरीब है ...

बचपन भी गज़ब का खूबसूरत समय होता है, न किसी प्रकार का संकोच, न किसी तरह का डर, एकदम इस दुनियां की समस्याओं से बेपरवाह, लेकिन कई बच्चों के सिर पर उसी समय ही खुद के और परिबचपन वार के पेट की आग को बुझाने का बोझ आ जाता है जो उम्र उस स्वर्णिम काल को बिना किसी चिंता, और तनाव के जी भर के जीने की होती है, जिसे पाने के लिए देवता भी तरसते है, इस अवस्था में जब कोई छोटू हाथों में कलम के बजाय रिंच, हथौड़े और खिलौने के बजाय भीख का कटोरा लिए दिखाता है, तो लगता है कि क्या सचमुच दुनिया इतनी गरीब हो गयी है या कलम और खिलौनो की कीमतें हथियारों से अधिक हो गई है |  
इस माह मैंने दो ऐसी घटनाएँ देखी जिसके कारण मैं यह सोचने पर विवश हुआ, पहली इस बार कुछ दिन पहले जब मै घर से नोयडा आने के लिए रेल यात्रा कर रहा था, एक 10-11 साल उम्र की एक लड़की ट्रेन में करतब दिखा कर पैसे माग रही थी, पूछने पर उसने अपना नाम शकीला बताया, जब मैंने उससे पूछा कि तुम स्कूल क्यों नहीं जाती हो, तो उसने कहा स्कूल जाउंगी तो पेट कैसे भरेगा, छोटा भाई, माँ और बीमार बाप भूखे सोयेंगे, यह घटना इस तरफ इशारा करती है की सिर्फ स्कूलों में कपडे, किताबें, और मिड डे मील भोजन दे कर सर्व शिक्षा अभियान को सफल नहीं बनाया जा सकता जब तक की समाज के एक ऐसे बड़े तबके के जीवन की मूल भूत आवश्यकताएं पूरी नहीं होती, जिसके गरीबी में रेखा जैसी चीज ही नहीं है, इस वर्ग में जब तक परिवार का प्रत्येक सदस्य कार्य नहीं करता तब तक सबको शाम का भोजन नहीं मिलता, ऐसे में बच्चा काम करेगा या स्कूल जाएगा |
दूसरी घटना कल की है, मै और मेरा एक मित्र हाथ में एक गुब्बारा लिए सड़क पर घूम रहे थे, तभी अचानक पीछे से मैले कुचैले कपडे में, रूखे बालों वाला एक बच्चा दौड़ते हुए आया और उसने मेरा हाथ पकड़ लिया, अचानक से मै पीछे मुडा और रुक गया, बच्चे ने मेरे पूछने से पहले ही गुब्बारा माग लिया, मै भी बिना सोचे उसके हाथ में पकड़ा दिया, फिर तो उसके चेहरे पर जो खुशी दिखी उसे देख कर कोई भी अभीभूत हो जाता,
बच्चा गुब्बारा हाथ में लिए उछलते कूदते अँधेरे में गुम हो गया लेकिन मै थोड़ी देर तक उसे जाते हुए निहारता और सोचता रहा की  क्या यही है देश का भविष्य, जो की गंदी, सीलन भरी अंधेरी बस्तियों में रहने के लिए अभिशप्त है, जो खेलने के जगह के लिए तरसता है ... या महा शक्ति कहलानेके करीब होने और मंगल पर अपनी ध्वजा फहराने के बावजूद हम इतने गरीब हैं की खिलौने वाले हाथों में कूड़ा बीनने का बोरा पकड़ना मजबूरी है
      

     

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